अपनों की रंगीली होली
अपनों की रंगीली होली
" चलो तुम भी चलो ना...होली है।खत्म करो अब भाभी से अपने झगड़े, तुम्हारी लड़ाई के चक्कर में मैं और भैया भी होली नहीं मना पाते आखिर 6 साल हो गए तुम्हारी लड़ाई को, क्या सच में तुम्हें याद है कि आखिर बात क्या थी? ", सुशांत ने रोहिणी से कहा।
" देखो मैंने तुम्हें कभी वहाँ जाने के लिए मना नहीं किया है, और ना उन लोगों के घर जाने से, लेकिन मुझे वहाँ जाने के लिए मत कहना जहाँ भाभी मुझे कोई काम ना आने के ताने देतीं थीं"। रोहिणी ने सुशांत से कहा।
" अरे 20 साल बड़ी हैं भाभी तुमसे, मुझे बच्चे की तरह पाला है। वो मेरी माँ ही तो हैं, अगर कुछ कह भी दिया तो क्या हुआ, हम इतने सालों से अलग रह रहे हैं तो साबित हो गया कि तुमने घर कितनी अच्छे से संभाला है "तभी मेन गेट खुला और सुशांत के भैया भाभी अंदर आ गये। उन्हे देख रोहिणी अपने कमरे में चली गयी।
" ताई जी... आप आ गयी, मुझे आपकी कितनी याद आती है पता है?", सुशांत की बेटी ने भाभी का हाथ पकड़ते हुए रोहिणी को आवाज़ लगाई
" मम्मा... मम्मा देखो ताई जी और ताऊजी आये हैं, बाहर आओ ना"
"मम्मा... " सुशांत की बेटी आवाज़ दे रही थी कि ताई जी ने उसे रोक कर ऊँची आवाज़ में कहा " मत बुला उसे सिम्मी, वो मुझसे गुस्सा है, लेकिन मैं उससे बिल्कुल गुस्सा नहीं हूँ, आखिर मेरी बेटी जैसी है और माँ बेटी को डांट भी सकती है,लेकिन उससे नाराज़ नहीं रह सकती , और देख तो कितनी होशियार हो गई है रोहिणी कितना कुछ बनाया है खाने में, गुझिया, नमक पारे, सेव, दाल मोठ, दही भल्ला, और खाना अलग से... वाह मेरी और ताऊजी की तो चाँदी हो गई आज, जल्दी बाहर आ जा रोहिणी नहीं तो तुम लोगों के लिए कुछ नहीं बचेगा। तूने घर भी कितना साफ और सजा रखा हुआ है "
हालांकि रोहिणी के मन में बहुत कुछ चल रहा था पर वो भाभी से इतनी भी नाराज़ नहीं थी जितनी पहले, उसके मन में उनके लिए अपार प्रेम और सम्मान था जो थोड़े गुस्से के काले बादलों से धूमिल हो गया था।
उसने दरवाज़ा खोला और भाभी के पैर छूकर उनसे हाथ जोड़कर माफी मांगी और कहा "मैं अपने तैश में ये भी भूल गई थी कि मेरी वजह से हमारे घर में हम सबमें कितनी दूरियाँ आ गई। मुझे माफ कर दीजिये भाभी", रोहिणी ने आँखें नीचे करते हुए कहा।
" तू माफी मत मांग, गलती मेरी भी है। तू नई थी और काम अपने तरीके से करती थी, मैं तो बड़ी हूँ समझना चाहिए था कि हर कोई अपने तरीके से काम करता है। मुझे मेरी भूल के लिए माफ़ कर दे रोहिणी", और रोहिणी ने भाभी को गले लगा लिया।
इस होली जैसे उस घर के बड़ों का आशीर्वाद स्वर्ग से बरस रहा था जिसने टूटे घर को एक कर दिया।
" अरे बाहर आकर रंग खेलोगी या हम ही अंदर आ जाएं ", सुशांत और भैया ने बाहर से आवाज़ लगाई। सभी ने बाहर आकर होली खेली और अपनेपन के रंग फिर कभी फीके नहीं पड़े।
