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sneh goswami

Tragedy


5.0  

sneh goswami

Tragedy


अणख

अणख

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 घर में चारों ओर चहल पहल थी । खुले आँगन में बाण की चारपाइयाँ और सूत की खाटें बिछी थी जिन पर आये हुए शरीके कबीले के लोग जँचे हुए थे । दूर नजदीक के सभी रिश्तेदार आये थे । शायद ही कोई छूटा हो । घर के सबसे छोटे बेटे राजिंदर का ब्याह था । कोई सगा जान - पहचान का छोड़ा नहीं गया और पहुँच भी सब गए थे । लडडू परांत भर भर आते । बालूशाही औरशक्करपारे के टोकरे के टोकरे खाली हो रहे थे । मेथी वाली मट्ठियाँ बेहद खस्ता बनी थी नमकपारे और भजिए अलग चल रहे थे । ऊपर चौबारे में पकौड़े औए प्याज के थाल पहुंचाए जा रहे थे । 

 औरतें गोटे , किनारी के दुपट्टे ओढ़े बातों में मस्त थी । कोने में बैठी बड़ी बुआ ने बन्ने की कली छेड़ ली । ऊंची हेक के सुर हवा में तैरने लगे । दूसरे सिरे से बचनी ताई ने रोटियाँ चुपड़ते हुए गीत की पंक्तियाँ दोहराई । लडकियाँ बातें करनी भूल गयी । गीत के बोल ऊँचे से ऊँचे होने लगे । सेहरा खत्म होते ही टप्पे की बारियाँ लगी । नानका ना दादका कोई किसी से कम नहीं । कोई हारने को तैयार नहीं ।.एक गीत खत्म होता , दूसरा छेड़ लिया जाता ।

  बेबे ने पुकार लगाईं – “ कुड़ियो ( लङकियों ) ! गाने तो सारी रात गाती रहना । पहले रोटी का काम निपटा लो । अभी जागो की तैयारी भी करनी है । आधी रात को जाओगी क्या गलियों में?"

"तू उठ मेरी रानी धी .......उठा थालियाँ । डालो रोटी “। लड़कियां उठी । रोटी परोसी जाने लगी । सत्ती ने गागर चमकानी शुरू की । मीतो ने आटे के दीवे बनाए । बत्तियां पहले ही बटी पड़ी थी । चनकौर चाची ने तेल में भिगो के रखी हुई थी । थोड़ी देर में ही यह सब औरतें रोटी खा पी के तैयार बर तैयार खड़ी थी पर इन मर्दों का क्या करें । यह तो पिए ही जा रहे थे । रोटी खाने का नाम ही नहीं लेते । बड़ी भाभी दो बार बुलाने गई पर कोई फायदा नहीं । हर बार एक ही जवाब । “ थोङा ठहर भाभी , बस दो मिनट । फिर खाते हैं “ । 

बेबे बोली – “ ओये यह तो आम दिनों में ही नहीं हटते । आज तो जश्न की रात है । शादी में आये हैं । आज तो रज रज के पियेंगे । तुम जाओ कुडियो ! अमरी और सीतो इन्हें खिला देंगी अगर खायेंगे तो वर्ना तो भुजिये और पकोड़ों से ही इन्होने रज्ज लेना है “ ।

दूल्हे की मामी ने जागो में तेल डाला । बतियो को सजाया और तीली दिखाई । लिशलिशकरती जागो जल उठी । दूसरी मामी ने जागो सिर पर उठाई और हँसती - खिलखिलाती लडकियाँ सडकों पर निकल आई । जीत कौर मिरासिन आगे - आगे लाठी खटकाती जा रही थी । पीछे पीछे औरतों का गोल चल पड़ा । पूरे गाँव में जागो के बोल गूँज रहे थे - "जागो आई है । जाग जट्टा जाग ( जागो भई ) अब जागो आई है ।" जागो की टोली एक घर के आगे रुकी । मौसी ने बोली शुरू की । गिद्धा शुरू हो गया । लङकियाँ नाच नाच दूहरी हो गयी । घर की मालकिन ने वारने किये । वाहे गुरु का शुक्र किया कि जागो घर में आई । जागो में तेल डाला । उस घर की बहुओं को साथ ले हंसती खिलखिलाती टोली अगले घर चल पड़ी । वहाँ घर वाले पहले ही जागो वालियों का शोर सुन के दरवाजा खोल के खड़े थे ।

“ आओ भई जी आओ . दिल भर के नाचो “।

“ ओर क्या चाची , गाँव वालो को भी तो पता लगे कि नानके से कोई आया है । मामियों -मासियों ने नाच-नाच के गाँव की सडकें नीची कर देनी है ।"

“ ले फिर नाचो भाई . मामियां जी खोल के पाओ बोली । यह दिन कौन सा रोज रोज आना हुआ । रुपिंदर से रहा न गया – “ ले मामी नाचें ।हमारी भाभियों जैसा नाच के दिखाए । भाभी मोरनी हैं निरी मोरनी “ ।

दूल्हे की मौसी ने ललकारा दिया - "आजो तुम भी मैदान में । हम भी तो देखे सिवियाँ की बहुएँ कैसी नाचती हैं । "

सबने जसविंदर कौर की ओर देखा । जसविंदर जिठानी के पीछे छिप गई । सबने हौंसला दिया – “ नाच बहु ! देवर की शादी में नहीं नाची तो कब नाचेगी “ । शर्माते - शर्माते जसविंदर ने घेरे में नाचना शुरू किया तो रंग ही बाँध दिया । देखने वालियाँ अश अश कर उठी । जागो वालियाँ एक घर से दूसरे घर और एक गली से दूसरी गली रौनक बांटती नाचती गाती जागो मोड़ के जब घर वापिस आई तो रात के ग्यारह बजने वाले थे । 

  किसी ने महफ़िल में सबको शराब पिलाते नाज़र को खबर दी –“ भाई आज तूने भाभी को नहीं देखा । क्या लग रही थी और क्या बोली डालती है । मोरनी जैसी घूमती है बाई । स्वाद ही आ गया देख के “ । पास बैठे बन्ते ने कहा - “ ओये क्यों बकवास कर रहा है तूने कहाँ देखा औरतों को नाचते “ । 

“ सोंह वाहेगुरु की मैंने देखा जब मान के घर में बोली पा रहे थे न तो मैं अपनी छत पे खेस ले के लेटा हुआ था । थोडा सा मुंह निकाल के सब देखा । मासी ने बोली उठाई और भाबियाँ नाच रही थी । सब से बढ़िया जसविंदर भाभी नाची “ । 

सब के चेहरे पर ईर्ष्या साफ़ दिखाई दे रही थी । उस देख के आने वाले बग्गे के लिए भी और नाच के वाह वाह कराने वाली का सिर का सांई होने के लिए नाज़ार से भी ।

नाज़र आज शाम से ही हर आये - गए की सेवा पानी में लगा था । कोई यह न कह दे कि सिद्धुओं की शादी में गए और सूखे ही आ गए । बोतलों पर बोतले खुल रही थी । आने वाला तो एक पैग पीता या दो पैग पर पिलाने के चक्कर में नाज़र आप कितनी पी चुका था खुद उसे भी पता नहीं था । लड़खड़ाते हुए उठा । सीधा जसविंदर के सामने पहुंचा - .: सुन बोली पा “ । जसविंदर इस अप्रत्याशित सवाल पर चकित रह गई । कोई जवाब देती , इससे पहले ही नाज़र ने उसका हाथ पकड लिया – “ चल नच्च मैंने भी देखना है “। ताई ने नाज़र को हटाया – “ बेवकूफ न होवे तो । चल ऊपर जाके सो जा “।

“ न ताई ! आज तो मैंने गिद्धा करना है वो भी जसविंदर के साथ “ ।

 जसविंदर इस अनोखी जिद से घबराई पड़ी थी कि बेबे ने उसे कमरे की ओर धकेला – “ चल बहु तू अपने कमरे में जा । यह तो पी पी के अपने आपे में नहीं है । सारी शर्म हया बेच के खा गया . . . “ ।

 संधू की माँ ने भी साथ देते कहा – “ जा रे पुत , अब सो जा । सुबह बरात भी चढ़ना है कि नहीं । जा शेर पुतर “ । पर नाज़र अड़ गया - “ मैंने नहीं सोना सूना अज्ज । बाहर बुलाओ बड़े चौधरियों की बेटी को । देखता हूँ , कैसे नहीं आती बाहर “ । 

उसने दरवाजे को जोर से लात मारी । अन्दर बैठी जसविंदर थर थर काँप रही थी । दरवाजा खोला तो मार पिटाई पर न उतर आये । क्या पता शराबी बंदे का । न भी मारे इतनी सारी बुजुर्ग औरतों के सामने कैसे उसका हाथ पकड के नाच पाएगी । उसका रोना निकल गया । बाहर नाज़र उसे पुकार रहा था । आवाजें सुन कर गुरदीप और जग्गू ऊपर से आये और नाज़र को बहला फुसला के पकड के उपर ले गए । जसविंदर ने सुख की सांस लिया । शुक्र है परमात्मा का जो सोने चला गया । बाहर औरतों ने नाज़र को बुरा भला कहना शुरू कर दिया था । साथ ही शराब को भी जिसके नशे में आदमी अपने होश खो बैठता है ।

  थोड़ी देर उपर शान्ति बनी रही । औरतें भी थक गई थी । बिस्तरों पे टेढ़े होने लग पड़ी कि ऊपर से आग की लपटें उठती दिखाई दी । चारों तरफ चीखने की आवाजे सुनने लगी । नाज़र ने खुद को आग लगा ली थी । लोग पानी की बाल्टियाँ लेके भागे । कुछ ने कम्बल उठाये । कोई पाईप ढूँढ रहा था । हर तरफ अफरा तफरी मची थी । सब ने आग बुझाने की कोशिश की पर आग बुझते बुझते भी नाज़र काफी जल गया था । इस तकलीफ में भी लगातार कहे जा रहा था – “ ये भी कोई जिन्दगी है साली जहाँ बीबी कोई बात ही नहीं सुनती । बेइज्जती करा दी भरी बिरादरी में । बड़ी बनती है साली । मैंने सारी अकड़ निकाल देनी है । सिद्घु से पंगा मंहगा पङेगा मंहगा “ । वह लगातार बुद्बदाये जा रहा था ।. लोगों ने उसे जीप में डाला । तुरंत शहर के अस्पताल ले जाया गया । जो लोग थोड़ी देर पहले नाजर और शराब को बुरा भला कह रहे थे । वही अब जसविंदर को गलियां दे रहे थे -

 “ अब सुखी हो गई उसे मरवा के “ ।

“ बेचारा लड़का अपनी बीबी से ही तो कह रहा था नाचने को “।

“ किसी और की बाँह तो नहीं पकड़ी न , अपनी की ही पकड़ी थी न । नाचने को ही तो कह रहा था बेचारा । कैसे हाथ छुड़ा के भाग गई “ ।

“ कमरा बंद कर के ही बैठ गई “ ।

“ नाच लेती तो बिचारे का दिल रह जाता “ ।

“ शराब तो सारेही पीते हैं । इसने कोई अनोखी पी थी क्या ? ”

“ और भाई की शादी में नहीं पिएगा , नहीं नाचेगा तो कब नाचेगा “ ।

 “ बेचारा बच जाए “ ।

 “ पता नहीं , क्या बनेगा “ ।

“ अच्छा खासा ब्याह इस कमजात की वजह से मातम में बदल गया “ ।

.जितने मुँह उतनी बातें हो रही थी । औरतें मर्द अपने अपने टोले में खड़े चर्चा मग्न थे । घर की औरतें जार जार रो रही थी । बेबे की आँखों में उसके लिए अभी से नफरत दिख रही है ।जसविंदर एक कोने में खड़ी अरदास कर रही थी - "नाजर किसी तरह बच जाए . कुछ न हो उसे । अगर न बचा तो ? क्या करेगी वह कहाँ जायेगी "। यह तो उसकी समझ ही नहीं आ रहा था कि उसका गुनाह क्या था । ऐसा क्या कर दिया उसने की वह मरने चल पङा । बच जाए तो नाजर से पूछेगी - ऐसी अनख , ऐसी जिद किस काम की कि बन्दा मर ही जाए । पर बचे तो सही , तभी पूछ पाएगी न । अभी तो उसे कोई अस्पताल भी नहीं ले के जा रहा । न ही वह खुद आगे होकर किसी से कह पा रही है कि मुझे भी जाना है । जब नाजर को जीप में डाल के लेजाने लगे थे तो वह भी नाज़र के साथ ही बैठने लगी थी पर उसके बैठने से पहले ही उसके ससुर ने जीप स्टार्ट कर ली थी । वह अपराधिन की तरह वहीं खड़ी धूल उडती देखती रह गई थी । अब किससे पूछे , कैसा है वो । बताएगा भी कौन उसे ।

 गुरे को अपने बापू से कहते सुना है - “ अस्सी परसैंट से ऊपर जल गया है । आई सी यू में डाला है “ ।

बच तो जाएगा न राम जी । बचा लेना उसे प्रभु । बचेगा तभी तो कुछ पूछ पाएगी । बचेगा तो इन सब को अपनी सफाई दे पाएगी । नाजर तू बच जा ना । सुना नाजर तूने , तू मुझे छोङ के मत जाना । 

आँख के कोर में आए आँसुओं को उसने वहीं जबरदस्ती रोक लिया है । अभी किसी कोने से कोई अपशगुनी का सुर उठने लगेगा इसलिए जब तक नाजर लौट नहीं आता , आँसू बिल्कुल बंद ।बङे घर की बङी सरदारनी की तरह जिएगी वह । उसने अणख से सिर ऊँचा किया और अपनी नजर गाँव की सङक पर टिका दी ।


  



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