अन्न की जात
अन्न की जात
सायरा नीचे आ बुलाकी सिंह से बोली "बाबा ये रोटियाँ लाई हूँ पका के, आप रख ले" बुलाकी जी ने उसके कटोर दान से रोटियाँ निकाल उसमे सब्जी डालते हुए बोले-"बेटा घर में चार आलू और गोभी ही रखी थी। मैने उसकी, क्या कहती हो तुम---हाँ---शोरबा , शोरबादार सब्जी बनाई है। तुम भी थोड़ी ले जाओ।" कहते हुए कटोर दान सायरा को पकड़ा दिया। बुलाकी सिंह और उनकी पत्नी कमला दोनो ही इस घर मे रहते थे। एक बेटा, वो फौज मे है। साल भर पहले ही वसीम और सायरा इस शहर में आये। वसीम की नौकरी यहाँ एक फेक्ट्री में लगी थी। वसीम के पिता और बुलाकी जी बचपन के लंगोटिया यार। दोनो के पुश्तैनी घर कानपुर में, अगल, बगल ही थे। बाद में बुलाकी जी दिल्ली आकर बस गये। वसीम जब उनसे मिलने आया बुलाकी जी बोले-बेटा जब तक तुम्हें फेक्ट्री से मकान नहीं मिलता। यहीं रहो, ऊपर दो कमरे खाली पड़े है।" वसीम और सायरा, बुलाकी जी और कमला को बाबा और अम्मी कहते। दोनो ही ,बूढ़े दम्पति के छोटे मोटे काम भी कर देते, उनका ख्याल रखते। बुलाकी जी को नॉनवेज से परहेज नहीं था। सायरा जब भी नॉनवेज पकाती, बाबा का निमन्त्रण रहता खाने का।
एक दिन सायरा बुलाकी जी से बोली "बाबा, आज तो अंडा करी बनी है। अंडा तो नॉनवेज नहीं मानते न। अम्मी खायेंगी क्या" "अरे बिटिया, तेरी अम्मी, बड़े नियम, धर्म वाली है। ब्राह्मण के घर जन्म नहीं लिया, पर उसके लच्छन पूरे ब्राह्मणी के है। अंडा तो दूर की बात वो तो बाहरी रसोई भी नहीं छूती" भले ही कमला सायरा की रसोई न छूती हो पर उसका सायरा के लिये मातृवत स्नेह कम न था। कुछ दिनो से शहर की हवा मे ज़हर घुला हुआ है। आदमी आदमी से खौफज़दा है। चारों ओर मारकट मची है। पर बुलाकी जी के घर के अंदर डर, भय, धर्म मज़हब नहीं, प्रेम बसा है। दोनो परिवार फ़िक्रमंद है एक दूसरे के लिये। बाहर कर्फ्यू है। अंदर वसीम भी चार दिन से बुखार में, और कमला की भी तबियत ठीक नहीं है। दो दिन के बुखार ने उसे तोड़ दिया। "उठ कमली, थोड़ा खा ले। खाली पेट कमजोरी और बढ़ेगी" बुलाकी रोटियाँ और सब्जी का कटोरा लिये उसके सामने बैठे है। कमली चौंकी "आपने बनाई ये रोटियाँ," ,"नहीं ,कनस्तर में छटाँक भर चून नहीं, रोटी कैसे बनाता। सायरा बिटिया दे गई है।" कमला चुप----- रोटी का कौर सब्जी में डूबा कर, कमला के मुँह की ओर बढ़ाते हुए बुलाकी बोले "कमली, अन्न की कोई जात नहीं होती। कोई धर्म नहीं होता। ये तो धरती माँ की देन है,सब के लिये बराबर।"
