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Rashmi Sharma

Abstract Drama


1.9  

Rashmi Sharma

Abstract Drama


अंधेरे के पलाश

अंधेरे के पलाश

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वो ढलती शाम थी। गर्म रेत सांझ का स्‍पर्श पाकर ठंडी हो चली थी। लड़की की निगाहें ढलते सूरज पर टिकी थी। सूरज हर पल रंग बदल रहा था और लड़की का चेहरा भी। एक अनकही खामोशी पसरी थी दोनों के बीच। लड़का हथेलियों में रेत भरकर मुट्ठियों से धीरे-धीरे छोड़ रहा था। हवा के साथ मिलकर रेत उड़ी जा रही था। 

लड़का चुप था। जैसे उसके पास भी शब्‍द चुक गए हो।
ये वो मौसम था जब सर्दियां उतर चुकी थी और गर्मी ने अपनी गिरफ्त में नहीं लिया था। हां, इसे बसंत का मौसम कहा जा सकता है, पर गिरते सूखे पत्तों से पतझड़ का आभास होता था। कि‍सी-कि‍सी दोपहर सूखी हवा चलती थी।

याद आया लड़की को, ये टेसू के खिलने का वक्‍त है, सेमल के संवरने का वक्‍त है। गुजरी याद ने उसके होंठों पर हल्की मुस्कान ला दी।

उसने लड़के से कहा- “तुम्‍हें याद है, ये वही दिन थे जब तुम मेरे पास आ रहे थे।”

लड़का अपुष्ट से अँधेरे में उसे अपलक देखने लगा, जैसे सिनेमा हॉल के अँधेरे में आँखें फाड़ कर कोई देख रहा हो। “हाँ, कॉलेज के आखिरी से पहले साल की बात है ये मुझे याद है सब “सूखे हुए होंठों से जैसे फूटा उस के।   

मगर लड़की ने सुना नहीं शायद वो आसमान की ओर निगाह उठाये बोलती ही रही ,जैसे किसी क्षोभ मंडल पर लिखी इबारत पढ़ रही हो कोई “हम मिले जब टेसू के जंगल में सूखी पत्तियों पर लाल लाल पाँतें बिछी होती थीं फूलों की, आसमान जरा बैंगनी हुआ करता था और फागुनी बयार से मन झूमा होता था तुम कि‍तने सारे रंग लेकर मेरे पास आया करते थे तब रोज इंद्रधनुष उगता था न आकाश में हमारे लि‍ए।”

लड़के को वो सब याद था, कॉलेज की साहित्य –परिषद का अध्यक्ष था वो और उसी साल पास के एक महानगर से लड़की,संस्कृति‍ ने कॉलेज में दाखिला लिया, अपनी साहित्यिक अभिरुचि के चलते जल्दी ही वो उदास सी, मगर बेहद खूबसूरत लड़की कॉलेज के हरेक कल्चरल प्रोग्राम का हिस्सा हो गई थी। लड़का डिबेट्स अच्छा बोलता था और कविता भी लिखता था, उन्हीं दिनों कॉलेज की एक स्मारिका के प्रकाशन की जिम्मेदारी डीन सर ने इन दोनों को दी थी और यही से अकेले मिलने का सिलसिला शुरू हुआ था। अब लड़के के होंठों पर भी मुस्कान आई, आवाज़ में विश्वास भर कर बोला वो “हां, याद है मुझे। तुम्‍हें पलाश के फूल बेहद पसंद थे। इसलिए मैं तुम्‍हें 'टेसू' कहने लगा था।

लड़की बोली, ”हां, तुम्‍हें नाम देने की आदत है। अच्‍छा लगता है किसी को भी क्‍योंकि‍ एक नया नाम मिलने से अहसास होता है कि‍ कोई मेरे बेहद करीब है, तभी तो वो एक नया नाम दे रहा है मुझे।”

“वैसे भी मुझे टेसू के फूल बहुत अच्‍छे लगते हैं” बोलते हुए मुस्कुरा पड़ी संस्कृति, सहज होने लगी जैसे।  

“हां। टेसू...मैं वाकई टेसू बन गई थी। तुम्‍हारे प्‍यार में आपादमस्तक लाल-नारंगी रंगी हुई । प्रेम कर रंग लाल ही होता है न, तुम्हीं कहते थे ना कि “क्रोमेटोलोजी’ यानी वर्ण विज्ञान जानता हूँ मैं।“

लड़का, जिसका नाम आकाश था...मुस्‍कुरा के हामी भरी उसने।

“कितना झूठ बोलते थे तुम उन दिनों, क्या अब भी? होंठों पर स्‍मित मुस्‍कान भर पूछ रही थी लड़की।

अब लड़की के आंखों का रंग लाल था। जैसे पलाश ने अपना रंग छोड़ दिया हो उसकी आंखों में। लड़की ने आंखें नीची कर लीं, जैसे छुपाना चाहती हो लड़के से जो छलक आया है अनचाहे ही। पलकें मूंद ली उसने। बूंदें गिरीं और रेत में जज्‍ब हो गई। वो कमजोर नहीं होना चाहती थी। कम से कम उसे दिखना नहीं चाहती थी। 

गए दिन की यादों ने एकदम से घेर लिया उसे। जब वो मिले थे तो कायनात बहुत खूबसूरत थी, या हो गई थी। फागुन उनकी देह में उतर आया था। सेमल का यौवन उफान पर था और उनके अरमानों के पंख को थकान नहीं होती थी कभी। प्रेम में डूबे वो, बाहों के गुंजलक से नहीं निकलना चाहते थे, कभी भी। जिंदगी इतनी हसीन कभी नहीं लगी थी इससे पहले। 

चांद निकल आया था अब जरा सा, मगर डूबते सूरज की लालिमा बाकी थी। लड़के को देख ऐसा लगता जैसे वो किसी अपराध बोध से घिरा है। वो उबरना चाहता है। चाहता है पहले की तरह थाम ले उस लड़की को। इतना करीब हो जाए कि‍ उसके कांधे पर सर रख रो ले। जानता है वो भी। जमे आंसू पत्‍थर से होते हैं जो सीने में इस कदर भारी हो जाते हैं कि‍ न दुख बाहर आ पाता है न खुशी, न प्‍यार, न माफी। पर वो यकीन खो चुका है, कि‍ हाथ बढ़ाने पर झटक नहीं दिया जाएगा उसका हाथ। चाहता तो है उसकी हथेलियों को फिर से कसना, पर कुछ है जो रोकता है उसे।
अस्फुट सा बोलने की कोशिश करता है वो...सुनो टेसू...लड़की की बड़ी बड़ी आंखें उसकी ओर उठती है, कुछ सवाल, कुछ अचरज लि‍ए। लड़के को अपनी ही आवाज अजनबी लगती है। लगता है ये नाम सदियों के बाद अपने होंठों पर ला रहा है वो, जैसे सारी मिठास खो गई है। मात्र एक संबोधन रह गया ये नाम। वह खुद पर झल्लाता है। ये क्‍या हुआ है। दि‍ल में प्‍यार तो है , मगर  उसकी जुबां में जो मिठास हुआ करती थी , वो जाने कहां चली गई। 

खुद को संभालकर बोलता है, बीते दिन हमेशा खूबसूरत लगते हैं टेसू। ये उन्‍हीं गुजरे पलों को कमाल है न जो हम आज भी साथ हैं, इस सांझ भी जब सूरज डूबने को है। बीते कई सालों की शाम और आने वाले अनगिनत शामों की तरह। 
सुनकर बड़ी फीकी सी मुस्कान उभरी लड़की के चेहरे पर, जैसे मुस्कराने में पूरी ताकत लगी हो फिर भी न मुस्‍कुरा पाए कोई। 

 लड़की फिर  कहती है...”हां यही दिन थे, जब तुम आए थे मेरे पास। यही मार्च का महीना। फागुनी बयार। कितना भर दिया था तुमने मुझे। मैं तुम्‍हारे अलावा कुछ और सोच नहीं पाती थी। दिन दोपहर, शाम, रात। बस तुमसे बातें और तुम्‍हारी बातें। देखो न हमारी किस्‍मत....यही वो दिन है जब तुम जा रहे हो। प्रेम का मौसम बि‍छुड़न के मौसम में तब्‍दील हो गया है। कितनी अजीब बात है..अब आगे की जिंदगी में जब भी फागुन आएगा...कभी मैं तुम्‍हारे प्रेम की यादों में गोते लगाऊंगी, कभी दर्द की लहरों पर सवार होकर वक्‍त के थपेड़े सहूंगी। 

मेरी किस्‍मत भी इन रेत के टिब्बों की तरह हो गई है। आवारा हवाओं को भी अब ये अख्तियार है कि‍ मुझे अपनी मर्जी से मोड़ ले, और कभी वो दिन भी थे कि जब किसी कोई अपनी जबान से मेरा नाम भी ले ये गवारा नहीं था तुम्हें”।

 लड़का खामोश, उदास बैठा रहा , सोचता ही रहा । रेत पर धंसी है उसकी हथेली, जैसे वो ढूंढ रहा हो अपनी बेगुनाही साबित करने को बातों का कोई सिरा। 

अचानक बोलने लगा “ आखिर मैंने किया क्‍या है, क्‍यों दूर हो रहे हम”।

लड़की सीधे उसकी आँखों में देखते हुए बोली “कुछ दुख ऐसे होते हैं जिन्‍हें किसी को नहीं बता सकते हम। कई बार जब हम दुखी होते हैं, सदमा लगता है, तो उससे उबरने की कोशिश में हम लड़ते-झगड़ते हैं। आरोप लगाते हैं। रोते हैं। उबर भी आते हैं। पर रिश्तों में कभी-कभी ऐसा भी होता है कि‍ आप इतना समझ जाते हैं, इतना दुख पी लेते हैं कि‍ आगे मिलने वाला दुख बेअसर हो जाता है। फिर आप चलते नहीं...वहीं रुक जाते हैं। माज़ी की खूबसूरत यादों को दुहराते हैं। प्रेम में जीते हैं। हंसते रोते हैं। मगर वो अतीत होता है। वर्तमान मर चुका होता है, भविष्‍य की कोई गुंजाइश ही नहीं रहती।
लड़का आंखों में दुःख और अचरज भरकर देखता है।

“तुम प्‍यार करती हो न मुझसे। आज भी”।

लड़की बेलौस मगर पूरे विश्‍वास के साथ बोलती है..”हां...करती हूं, बहुत करती हूं। सिर्फ तुमको ही किया है,तुम्‍हें ही करूंगी;” 

 “तो क्‍यों कहा, ये बि‍छुड़न का वक्‍त है, कि‍ मैं जा रहा हूं। मैं कहाँ जा रहा हूं, तुम कहां जा रही हो... बोलो” 

संस्कृति‍ उदास आंखों और भरपूर नजर से देखती है उसे। आकाश की आंखों में असमंजस है। लड़की की नजर आसमान की ओर उठती है। अंधेरा होने को है। चांद निकला है मगर उसकी रौशनी इतनी नहीं कि‍ सब कुछ साफ नजर आए। जल्‍दी ही दोनों अंधकार की गिरफ्त में होंगे।

अब कह रही है संस्कृति‍।।”चलो अब रात हुई , अब अंधेरे के सिवा कुछ नहीं। किसी का जाना तोड़ता है, पर जाना ही पड़ेगा अब फागुन के रंग बड़े फीके होंगे तुम अपना ख्‍याल रखना”

वह अवाक सा बैठा बस सुन रहा है , हालांकि उसे पहले से पता था वक़्त के इस दौर में इस से ज्यादा कुछ नहीं उस के हिस्से में  मगर फिर भी कोई हौल सा उसके सीने में पैठ रहा है , चेतना साथ छोड़ रही हो जैसे धीरे धीरे उसी लड़की की तरह।   
“सुनो। लड़की उसे टहोकते  हुए उठकर कपड़ों से रेत झाड़ती हुई बोल रही  है।”जब टेसू दहकेगा तो मुझे याद करोगे न , यादों के जंगल में हर बरस टेसू फूलेंगे, सेमल से रूई के फाहे उड़ेंगे तब  मैं आऊंगी न याद तुमको।या कोई और फूल तुम्‍हें अच्‍छा लगने लगेगा” विहंस उठी हो जैसे आखिरी बात बोलते हुए लड़की। मगर नहीं लड़का स्पष्ट देख पा रहा है भीगी हैं लड़की दोनों बड़ी बड़ी आँखें।

आकाश एक आह भरकर ढह जाता है रेत के समंदर में।

 संस्कृति‍ बिना जवाब सुने आगे बढ़ने लगी। उसके पैर रेत में धंसे जा रहे हैं।अंधेरा घना होने लगा था। धीरे-धीरे लड़की ओझल हो जाती है उसकी निगाहों से। 

दूर पलाश की टहनी पर चाँद अटका है। टेसू के जंगल में आग लगी है। धू-धू जल रहा सारा जंगल। लगता है फागुन फिर आया है।


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