अमूल्य वनस्पति
अमूल्य वनस्पति
...जब हम छोटे थे...खेल-खेल में कभी ढेर सारे तुलसी के पत्तों को वजह-बेवजह चबाते रहते थे।नीम का पत्ता थोड़ा कड़वा लगता था,पर उसे भी चबा लेते थे।ऐसे जामुन और लीची के पत्तों को भी चबाया है हमने।जामुन के पत्तों को चबाकर पानी पीने में असीम आनंद की अनुभूति होती थी।और लीची के पत्ते तो अभिभावकों को बेवकूफ बनाने के लिए खा लेते थे कि वे हमारे लाल होठों को देखकर चोरी-चुपके पान खाने की आदत को सही मान बैठे।
...जब पकड़म-पकडाई खेलते तो लता पीपर के पत्तों को चबा डालते तो कभी यूँ ही टाइम-पास के लिए खटमिट्ठी के पत्तों को चबाते रहते।भटकोंआ के पत्ते और फल का सेवन तो रोज़मर्रा की बात थी।
...एक दिन हमारे घर एक पधारे एक वैद्य महोदय ने शीशम के कोमल पत्तों से 'साइनसाइटिस' के इलाज का संकेत क्या दे दिया...कैंपस के सभी शीशम के पौधों की कोमल पत्तियाँ धीरे-धीरे गायब होने लगी।
...आम के पत्तों को तोड़कर उसके डंठल को भी आम की सुगंध के फेर में चबाया है।पिताजी जब बेल के पत्तों का नियमित सेवन करते थे,तो मैं एक पत्ता तो खा ही लेता था रोज़।अब पुदीना खुद को क्यों अकेला महसूस करे,सो उसके पत्तों को चबाने के लिए तैयार थें हम!थोडे़ बड़े हुए तो कहीं से मालूम चला कि चिरैता के पत्ता को चबाने से खून साफ होता है।चेहरे पर रौनक रहती है...बस क्या था चिरैता के पत्तों का उस दिन से प्रयोग शुरु हो गया।हालांकि बहुत कड़वा लगता था,लेकिन नया खून बनने की लालसा के आगे कड़वापन कोई मायने नहीं रखता।
...हमारे एक पड़ोसी की आदत बन गई थी कागजी नींबू माँगने की।माँ उनकी इस आदत से परेशान थीं,सो एक दिन उन्होंने साफ इनकार कर दिया कि नींबू नहीं है,लेकिन अगले पल उन्होंने नींबू के पत्तों की माँग कर दी।मज़बूरी में देना पड़ा।बाद में मैंने प्रयोग के तौर पर एक दिन नींबू के पत्तों की चाय बनाकर पी।बड़ी अच्छी चाय बनी और आगे नींबू नहीं रहने पर उसका भी प्रयोग किया जाने लगा।आज लोगों को लेमनग्रास की चाय पीते हुए पता नहीं क्यों कृत्रिमता का आभास होता है!
...हरसिंगार के पत्तों का भी मैंने स्वाद लिया है और स्वयं को बुखार से आराम होते पाया है।और तो और गिलोय तो हमारे परिवार का स्थाई सदस्य था।युक्लिप्टस के पत्ते,गेंदा के पत्ते,दूब,गुलाब,कमल की पँखुड़ियाँ और न जाने कितनी वनस्पतियों ने हमें नीरोग बनाए रखा है।...कोरोना काल में विश्व के अन्य देश भारतीयों की रोग प्रतिरोधक क्षमता के आगे नतमस्तक हैं।कोरोना के प्रसार में आई कमी के पीछे की एक मूल वजह हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता भी है।...आज की पीढ़ी जंकफूड के चक्कर में प्रकृति की अमूल्य संपदा को मज़ाक के रूप में ले रही है।और यह मज़ाक हमारे लिए ज़हर से कम नहीं है।
...आज जब आकाश से धरती और सागर की अतल गहराइयों तक सभी शुद्ध एवं पवित्र हो रहे हैं,हमें भी प्रकृति की ओर लौटना होगा..!आइए प्रकृति की अमूल्य संपदाओं को अपने परिवार का एक प्रमुख सदस्य बनाएँ।
