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Anand Mishra

Action

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Anand Mishra

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अग्निवीर

अग्निवीर

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8

हैदराबाद
वर्ष 2031

राष्ट्रीय औद्योगिक सुरक्षा प्राधिकरण के विशेष अन्वेषक आदित्य वर्मा को एक नए दायित्व पर नियुक्त किया गया।

उनका कार्य केवल अपराधियों को पकड़ना नहीं था।

वे उन कमियों को भी खोजते थे जिनका लाभ उठाकर अपराध जन्म लेता है।

उनका एक ही सिद्धांत था—

"किसी संयंत्र की सबसे बड़ी सुरक्षा उसकी दीवारें नहीं, बल्कि उसकी व्यवस्था होती है।"

एक सुबह उन्हें एक अत्यंत गोपनीय सूचना मिली।

देश के तीन बड़े औद्योगिक संयंत्रों में लगभग एक ही समय पर तोड़फोड़ की योजना बनाई गई थी।

यदि योजना सफल होती, तो करोड़ों लोगों की बिजली, ईंधन और आवश्यक रासायनिक उत्पादों की आपूर्ति बाधित हो सकती थी।

प्रारम्भिक रिपोर्ट में इसे बाहरी साजिश माना गया।

लेकिन आदित्य ने पूरी फ़ाइल पढ़ने के बाद कहा—

"यह काम किसी ऐसे व्यक्ति का है जो संयंत्रों की कार्यप्रणाली भीतर से जानता है।"

उन्होंने घटनास्थलों का निरीक्षण किया।

कोई विस्फोट नहीं हुआ था।

कोई उपकरण चोरी नहीं हुआ था।

लेकिन कई सुरक्षा प्रणालियों में अत्यंत सूक्ष्म परिवर्तन किए गए थे।

ऐसे परिवर्तन जिन्हें केवल अनुभवी अभियंता ही समझ सकता था।

उन्होंने एक अलग दिशा में जाँच शुरू की।

पिछले एक वर्ष में किन वरिष्ठ अभियंताओं ने अचानक नौकरी छोड़ी?

किन निजी सुरक्षा सलाहकारों ने महत्वपूर्ण उद्योगों के साथ नए अनुबंध किए?

किन कंपनियों ने हाल के महीनों में "आपातकालीन सुरक्षा समाधान" बेचने शुरू किए?

धीरे-धीरे चित्र स्पष्ट होने लगा।

एक निजी सुरक्षा समूह पहले कृत्रिम संकट उत्पन्न करता था।

फिर उसी संकट का समाधान बेचकर भारी लाभ कमाता था।

भय उनका व्यापार था।

उस नेटवर्क का संचालन कर रहा था—

राघव नायर

एक प्रतिभाशाली अभियंता।

जिसने अपनी तकनीकी क्षमता का उपयोग सुरक्षा बढ़ाने के बजाय सुरक्षा तोड़ने में करना शुरू कर दिया था।

आदित्य ने तुरंत छापा मारने का आदेश नहीं दिया।

उन्होंने कहा—

"यदि आज हम केवल कुछ लोगों को पकड़ेंगे, तो छह महीने बाद यही व्यवस्था किसी और नाम से लौट आएगी।"

उन्होंने तीन समानांतर टीमें बनाईं।

पहली टीम ने सभी संयंत्रों की नियंत्रण प्रणाली की स्वतंत्र जाँच की।

दूसरी टीम ने वित्तीय लेन-देन और शेल कंपनियों का विश्लेषण किया।

तीसरी टीम ने संभावित कमजोरियों को बिना शोर किए पहले ही ठीक करना शुरू कर दिया।

कुछ सप्ताह बाद गिरोह ने अंतिम योजना लागू की।

रात ठीक दो बजे उन्होंने नियंत्रण प्रणाली में प्रवेश करने का प्रयास किया।

उन्हें विश्वास था कि कुछ ही मिनटों में पूरा संयंत्र ठप हो जाएगा।

लेकिन इस बार हर आदेश पहले एक पृथक सत्यापन प्रणाली से होकर गुजर रहा था।

गलत आदेश स्वतः अस्वीकार हो गए।

संयंत्र सुरक्षित मोड में चलता रहा।

उधर सभी डिजिटल गतिविधियाँ रिकॉर्ड होती रहीं।

उसी समय देश के अलग-अलग शहरों में संयुक्त कार्रवाई शुरू हुई।

पुलिस।

औद्योगिक सुरक्षा दल।

साइबर विशेषज्ञ।

वित्तीय अन्वेषक।

सभी पहले से तैयार थे।

कुछ ही घंटों में पूरा नेटवर्क उजागर हो गया।

अवैध अनुबंध।

झूठी सुरक्षा रिपोर्टें।

कृत्रिम संकटों का इतिहास।

विदेशी खातों में भेजा गया धन।

सबके प्रमाण मिल गए।

गिरफ्तारी के बाद राघव ने आदित्य से कहा—

"मैं एक उत्कृष्ट अभियंता था।"

"यदि व्यवस्था ने मेरी प्रतिभा का सम्मान किया होता, तो आज मैं यहाँ न होता।"

आदित्य ने शांत स्वर में उत्तर दिया—

"सम्मान प्रतिभा से मिलता है।"

"विश्वास चरित्र से।"

"प्रतिभा तुम्हारे पास थी।"

"चरित्र का निर्णय तुमने स्वयं लिया।"

मुकदमा कई महीनों तक चला।

निर्णय आने के बाद सरकार ने पूरे देश के महत्वपूर्ण उद्योगों के लिए नई सुरक्षा व्यवस्था लागू की।

हर संयंत्र में स्वतंत्र सुरक्षा लेखा-परीक्षण अनिवार्य किया गया।

डिजिटल और भौतिक सुरक्षा का संयुक्त मूल्यांकन शुरू हुआ।

कुछ समय बाद एक युवा अभियंता ने आदित्य से पूछा—

"सर, किसी सुरक्षा अधिकारी की सबसे बड़ी शक्ति क्या होती है?"

आदित्य ने उत्तर दिया—

"हथियार नहीं।"

"अनुभव भी नहीं।"

"सबसे बड़ी शक्ति है—समस्या को तब पहचान लेना, जब वह अभी दुर्घटना नहीं बनी हो।"

वह कुछ क्षण रुके और फिर बोले—

"जिस दिन हम संकट आने के बाद नहीं, बल्कि उससे पहले सोचने लगेंगे..."

"...उस दिन सुरक्षा एक विभाग नहीं, एक संस्कृति बन जाएगी।"

राष्ट्रीय औद्योगिक सुरक्षा अकादमी के प्रवेश द्वार पर बाद में एक शिलालेख स्थापित किया गया।

उस पर लिखा था—

"सच्चा रक्षक वह नहीं जो हर संकट से लड़ता है।
 सच्चा रक्षक वह है जो संकट को जन्म ही नहीं लेने देता।"



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