अबॉर्शन
अबॉर्शन
"सुनो, मैं अगले छ महीने नहीं आ सकता। नई नौकरी है।"
"नौकरी ही सबकुछ है पत्नी बच्चा कुछ भी नहीं!"
"बच्चा?"
"हां! मैं मां बनने वाली हूँ"
"पहले क्यों ना बताया ।मै ऑन साइट नहीं लेता।"
"अब कौन सी देर हो गई?"
"देर हो गई है। मैं बीच में लौटा तो कंपनी से निकाल दिया जाऊंगा।"
"ओह!"
"तुम अबॉर्शन करा लो!"
"नहीं।हत्या है ये।"
"हमने घरवालों का विरोध कर शादी की । मदद करने वाला कोई नहीं। पहली नौकरी है जिसमें कोई स्थायित्व नहीं।ऐसे में नई जिममेदारियां अकेली कैसे उठा पाओगी।"
" ........"
"हैलो.....हैलो...."
"अबॉर्शन होगा पर मेरे बच्चे का नहीं बल्कि हमारे रिश्ते का। मैंने तुम्हे अपने पति के पद से हटाया। जब तुम अपने बच्चे को जीवन देने में हिचकिचा रहे हो तो तुम्हारे जीवन में मेरा या मेरे प्रेम का भला क्या स्थान......?"
कुछ देर सोचा और फैसला कर लिया।
"सुनो....समझने की कोशिश करो। अभी कुछ डेवलप नहीं हुआ। नौकरी सलामत रही तो हम फिर बच्चा प्लान कर लेंगे।"
"कहना क्या चाहते हो?"
"इतनी सेंटीमेंटल क्यों हो रही हो? कितने मिसकैरेज होते हैं। कुछ पता भी है?"
"मर्द हो ना ,नहीं समझोगे। हत्या व मौत दो अलग-अलग बातें हैं। अपने बच्चे को जीवन देना मेरा अधिकार है।"
कहकर उसने फोन रख दिया था।आज इस अजन्मे के साथ ही उसके अंदर एक मां ने जन्म लिया था। चाहे जो हो जाए अपने बच्चे को जन्म देकर रहेगी। पर कैसे क्या करना है इसी ऊहापोह में पूरी रात सो ना सकी। सुबह ही मोबाइल बजा। उस तरफ राज था।
"हत्या और मौत में ग्लानि का फर्क होता है। तुमने आँखें खोल दीं। मैं अगले महीने तुम्हारे यहाँ आने का प्रबंध करता हूँ। अंजाने में जो तकलीफ पहुँचाई ,उसके लिए माफ करना।"
आँखें नम हो आईं। सुबह का भूला अगर शाम को लौट आये तो उसे भूला नहीं कहते।
