Poonam Rohaj

Abstract


4.3  

Poonam Rohaj

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आत्मविश्वास बना फेयर एंड लवली

आत्मविश्वास बना फेयर एंड लवली

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लोग कहते तो सुने थे कि आज के इस कलयुग काल में घोर कलयुग ने पांव धर लिया हैl मैं यह सुनकर अनसुना कर दिया करती थी पर एक दिन मैंने यह करीब से महसूस किया और विचार किया कि जब एक माँ जिसके लिए बच्चों को लेकर पाँचों उंगलियाँ बराबर होती हैं.. वह उन में भेदभाव करने लगे तो उसे घोर कलयुग ही कहा जा सकता हैl

माँ के लिए “बच्चा कितना ही कुरूप क्यों ना हो उसके लिए वह दुनिया का सबसे सुंदर बच्चा होता है” अभी तक ऐसा सुना था पर वास्तव में देखने में आया कि इस कलयुग में यह होना अब मुमकिन नहीं l

यह बात मेरे पड़ोस में रहने वाले एक परिवार को देखकर मैंने जानी l सुनीता जो अपने चार बहन-भाइयों में सबसे बड़ी थी, देखने में कुछ खास नहीं, परिवार के मुकाबले रंग भी कुछ गहरा था परंतु किसी के रंग से अगर किसी को आपत्ति हो तो समझ आता है लेकिन यहाँ तो उसकी जननी को ही उसके रंग से आपत्ति थी lवह हर बात पर उसे कहती“ तेरे पर कुछ नहीं जचता, रंग भी तो पक्का ले रखा है l”

सुनीता ने इतनी बार सुन लिया था कि अब उसे आदत थी वह बुरा नहीं मानती थी पर उसे बहुत दुख होता था जब उसकी माँ उसके रंग के कारण उसे अपने साथ कहीं नहीं ले जाती थी l

जैसा कि हर बच्चे को यह सौभाग्य प्राप्त होता है कि वह अपनी माँ के साथ साथ मामा-चाचा-ताऊ के यहाँ घूम आया करते हैं l यह सौभाग्य सुनीता को नहीं था वह अकेले छुटपन में कई बार दादी के पास या बुआ के यहाँ गाँव में कई-कई महीनों रही है l

उसे वहाँ अपनी माँ की बहुत याद आती पर उसके पास कोई चारा ना था lसुनीता अपने आँसुओं को आँखों में ही पी जाया करती थीl धीरे-धीरे उसके सारे छोटे भाई बहन भी यह जान गए थे कि सुनीता हम जैसी नहीं है, वे भी बालपन की लड़ाई में उसे काली, काली-माँ आदि नामों से संबोधित कर दिया करतेl धीरे-धीरे सुनीता ने अपनी माँ के साथ रहने का सपना भी पीछे छोड़ दियाl माँ भी उसे अपने पास रख कर खुश नहीं होती थी l

माँ का स्नेह पाने के लिए सुनीता ने घर का हर कार्य सीखा कि शायद प्यार से ही उसकी माँ उसे गले लगा कर कहे कि “मेरी बेटी कितना काम करती है l”पर अफ़सोस अब घर का काम करना उसकी जि़म्मेदारी और कर्तव्य दोनों ही बन गए थे lमाँ का स्नेह ना पाकर सुनीता बहुत दुखी होती थीl उसके बाल मन को कचोटने में माँ ने कभी कसर न छोड़ी, सब बच्चों के सुंदर कपड़े आते पर सुनीता को मौसी, बुआ आदि के यहाँ की उतरन ही पहनने को मिलती थीजब कभी वह नई ड्रेस के लिए माँ से पूछती तो उत्तर मिलता “तुझ पर कुछ जचता तो है नहीं, क्या करेगी नया पहनकरl”

अब यह सब सुनीता के मस्तिष्क पर असर करने लगा थाl उसका आत्मविश्वास लगभग खत्म थाl अब वह अपने को कुरूप और काला ही समझती थीI

कभी-कभी वह अकेले में बैठकर सपने बुनती और सोचती कि- “काश! सिंड्रेला की कहानी की तरह मुझे भी कुछ मिल जाताl”“काश! भगवान आकर एक बार मुझसे पूछ ले कि बता तुझे क्या चाहिए और मैं झट से भगवान से गोरापन माँग लूँ l”कोई धन माँगता है, कोई दौलत माँगता है, कोई ऐसे मौके को नहीं जाने देना चाहता कि भगवान मिले और वह कुछ बड़ा ना माँगेl पर सुनीता को माँ का प्यार पाने के लिए सिर्फ गोरापन चाहिए थाl

सुनीता ने सच में हार नहीं मानी थीl वह कभी-कभी अकेले में खुद को ही चूमती और कहती 

“कोई बात नहीं मैं खुद से प्यार करूँगी मैं अपने लिए काफी हूँ l”बहुत कुछ झेला था उस बच्ची ने अपने माँ-पापा के साथ और घर की बड़ी बेटी होने के नाते सदा अपने बहन-भाइयों को मातृप्रेम देकर पाला थाl परंतु उसे बदले में कुछ नहीं मिला सिवाय तिरस्कार के lपर मैं अचंभित हूँ, बहुत कोशिशों के बाद भी उस बच्ची ने हार नहीं मानी l माँ के अनेक जतन के बाद भी पढ़ाई नहीं छोड़ी l वह हमेशा सुनती थी कि “तुझे तो घर गृहस्थी ही संभालनी है l क्या करेगी पढ़कर? ”

यहाँ सब कुछ बयान करना तो मुमकिन नहीं पर संक्षेप में यह है कि सुनीता ने अपनों से ही सोतेलों जैसा व्यवहार झेला था lउसके जीवन में बदलाव आया जब उसने कॉलेज में दाखिला लियाl वह पुराने कपड़े पहन कर ही जाती….. ..वही ….उतरन! पर फिर भी लोगों ने उसकी सरहाना की l

शुरू-शुरू में उसे बड़ा अटपटा लगा l कभी आदत जो न थी, उसे लगता है कि लोग शायद मज़ाक उड़ाने के लिए ऐसा कहते हैं, या झूठा कंप्लीमेंट देने का चलन होगा कॉलेज मेंl

पर जब धीरे-धीरे कुछ दोस्त बने और वह कभी उनके बीच बैठकर अपने कालेपन की बात करती तो लोग कहते –“कहाँ.....? किसने कहा तुम काली हो? और होती भी... तो भी तुम सुंदर होl”

धीरे-धीरे सुनीता का खोया आत्मविश्वास लौट रहा थाl उसने कॉलेज के कई फेस्ट में मिस कॉलेज क्वीन जैसी प्रतियोगिताओं में भी भाग लिया था l लोगों ने उसे खूब प्रोत्साहित भी किया l

सुनीता के जिंदगी में असली बदलाव तो तब आया जब उसके जीवन में उसके सपनों के राजकुमार ने आकर उसका हाथ थामा और पूछा- “मुझसे शादी करोगीl”सचमुच कितना सुंदर था वहl

सुनीता को जैसे यकीन ही नहीं आ रहा था कि कोई इतना सुंदर लड़का खुद से उससे शादी करने का प्रस्ताव रख सकता है....!!उसके उसी साथी ने उसे जड़ से यकीन दिलाया कि “तुम जैसी भी हो, बहुत सुंदर होl”

सुनीता की माँ आज भी हैरान है कि इतने सुंदर लड़के ने उसका हाथ कैसे थामा…..? 

तब से सुनीता के सपनों को जैसे पंख लग गए और उसने अपनी राजकुमार के साथ अपने सपनों की दुनिया को साकार रूप दिया l आज वह सफल गृहणी के साथ-साथ एक अध्यापिका हैl



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