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आखरी गुलाब

आखरी गुलाब

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माँ तुम्हें कुछ नहीं होगा तुम बस आंखें खुले रखो बस हम पहुंचने ही वाले हैं-

रौनक तेज़ी से कार को ड्राइव कर रहा था। पिछली सीट पे रौनक की पत्नी निधि अपनी सास को थामे हुए बैठी थी। रौनक की माँ शैलजा की तबियत अचानक बिगड़ गयी थी उनको जल्द से जल्द हॉस्पिटल ले जाया जा रहा था। 

निधि माँ के सिर को अपनी गोद मे लिए लगातार उनकी हथेलियों को रगड़ रही थी उन्हें हौसला दे रही थी। 

दूसरी तरफ रौनक बस फटाफट से हॉस्पिटल पहुंच जाने की कोशिश में बड़ी तेजी से ड्राइव कर रहा था। रात के करीब 1:30 बज रहे थे। खाली सड़क पे रौनक की कार सनसनाती हुई चली जा रही थी। आखिरकार हॉस्पिटल के दहलीज़ पर कार जा रुकी और फटाफट रौनक और निधि माँ को डॉक्टर के पास ले गए। 

करीबन 2 बजे के वक्त सारे नींद भर रहे थे। एक आद स्टाफ जो नज़र आए उन्होंने डॉक्टर को इत्तिला दिया और फिर डॉक्टर अपनी आंखें मचलते हुए आये। जाहिर है उनकी भी आंख लग गयी थी शायद लेकिन डॉक्टर होने के नाते उनका फ़र्ज़ है किसी भी वक़्त बिना किसी आनाकानी के अपना मानव धर्म निभाए। रौनक की माँ को अंदर इलाज के लिए ले जाया गया। 

रौनक और निधि बाहर इधर से उधर हुए जा रहे थे। 

कुछ आधे घंटे तक इंतज़ार के बाद डॉक्टर बाहर आते दिखे। रौनक भागता हुआ उनके पास गया।

डॉक्टर, मेरी माँ की हालत कैसी है वो ठीक तो है न ?

"मिस्टर रौनक आपकी माता जी की हालत खराब है आप अपने रिश्तेदारों को बुलवा लीजिये।" डॉक्टर ने कंधे पर हाथ रखते हुए कहा। 

मतलब साफ़ था। शैलजा अब कुछ ही पलों की मेहमान थी। 

असल मे शैलजा देवी हार्ट पेशेंट थी। इससे पहले भी ऐसा दौरा आ चुका था जिसके बाद से उनके खान पान में बदलावऔर देख रेख में सावधानिया बरती जाती रही थी। लेकिन तबियत का क्या है वो कभी भी खराब हो सकती है और आज आधी रात अचानक इनकी तबीयत बिगड़ गयी। 

वैसे शैलजा की कहानी में कई उतार चढ़ाव भी रहे थे। वो एक फौजी की बीवी थी मगर रौनक जब 6 साल का रहा था तब सरहद में जंग के दौरान शैलजा के पति शाहिद हुए थे। पति के जाने के बाद घर के साथ साथ रौनक और बूढ़ी सास दोनों की जिम्मेदारी शैलजा पर ही थी लेकिन शैलजा ने हिम्मत नहीं हारी। कैसे हारती एक फौजी की पत्नी जो थी। 28 साल की उम्र में विधवा हुई औरत को समाज मे कितने ही तकलीफों से गुजरना पड़ता है मगर फिर भी इस भेड़ियों की दुनिया मे भी शैलजा ने खुद को संभालते हुए अपना फर्ज निभाया। घर को भी संभाला बेटे को भी अच्छे से बड़ा किया हर जरूरत को पूरा किया लेकिन आज शैलजा अस्पताल के बेड पे आखरी सांसें गिन रही थी। 

" माँ तुम्हें कुछ नहीं होगा।" 

रौनक ने अपनी माँ के माथे पर हाथ फेरते हुए कहा। 

शैलजा ने आंखें खोली तो सामने बेटे और बहू को पाया।

शैलजा ने हल्की मुस्कान लाते हुए लडख़ड़ाती शब्दों में बोली, "अब और वक़्त नहीं है मेरे पास .. ऊपर से बुलावा आ चुका है ..बेटा। बार बार दिल पे वॉल्व लगाते रहूं क्या।"

इतना सुनते ही रौनक और निधि की आंखें भर आयी। 

ऐसा कहा जाता है कि इंसान अपने आखरी सांसो में ये एहसास कर लेता है कि ये सांसे अब खत्म हो रही है और बुलावा आ गया है। शायद शैलजा भी एहसास कर चुकी थी।

रौनक माँ के बगल में बैठा हुआ उसे भीगी पलको से देखने लगा। निधि भी अपनी मां समान सास के हालत पर बेहद दुखी थी। 

बेटा मेरी एक बात सुनेगा ?

बोलो न माँ। कौन सी बात है ?

मेरे कमरे में जो अलमारी है उसके तिजोरी में एक छोटा सा बॉक्स होगा। उस बॉक्स को मेरे साथ ही रवाना करना। 

रौनक ने आश्चर्य होकर पूछा,

"कैसा बॉक्स माँ ? उस बॉक्स में क्या है ?"

शैलजा कुछ पल के लिए खामोश हो गयी। मानो उसे वो लम्हा आंखों के आगे आता नज़र आ रहा था जिसके दरमियां उसे वो चीज़ मिली थी।

"उसमें तुम्हारे पिता की यादें है।"

शैलजा ने लम्हों को याद करते हुए कहा।

कैसी यादें ? रौनक ने धीमे से पूछा।

उन दिनों तुम्हारे पापा छुट्टी पे थे। देश की सेवा से थोड़ा राहत ले कर घर लौटे थे। तुम 5-6 साल के थे तुम्हारे पापा बहुत खुश मिज़ाज़ के साथ साथ बहुत प्यारे व्यक्तित्व के थे। हर बार जब वो घर लौटते थे लगता था ज़िन्दगी घर लौट आयी है। इन दिनों जितने भी वक्त साथ बिता सकते थे वो कम ही लगता था। 

कभी कभी हार कर मैं उनसे कह देती थी :

"तुम छोड़ दो न ये फौज की नौकरी। कुछ और काम करो। मुझे हमेशा डर बना रहता है कंही तुम्हे कुछ हो गया तो मेरा और इन बच्चों का क्या होगा। मुश्किल से घर लौटते हो उसमे भी अक्सर तो फौज से बुलावा आ जाता है। कितना मुश्किल से गुजरता है एक एक पल मालूम है ?"

वो मेरी बातों को हँसी में उड़ा कर कहते थे , 

"ओय फौजी की बीवी हो कर ऐसी बातें करती है। तू फिक्र मत कर। मुझे कुछ नही होगा। कोई तेरे प्यार को तुझसे नही छीन सकता। सारे बंदों की बीवियां , माँ और परिवार वाले ऐसे सोचने लगे और बन्दे फौज में जाना बंद कर दे तो देश की रक्षा कौन करेगा फिर ??! तेरा तकलीफ समझता हूँ मगर देश की सेवा करना मेरा धर्म है तू चाहती है कि मैं सेवा करना छोड़ दूँ ?

और फिर मैं आंसू भर के बस उनके गले लगने के अलावा कुछ कर भी नहीं पाती थी।

शैलजा की आवाज़ लड़खड़ाती हुई जारी रही,

मुझे याद है वो आखरी पल जब वो छुट्टियों में घर लौटे थे। कुछ 2 महीने की छुट्टी थी। हम बाहर गए घूमने के लिए। अपने तमाम रिश्तेदारों के घर भी हो आये थे। इसी बीच मेरी जन्मदिन भी थी। उस दिन देर रात तक जश्न हुआ। सारे दोस्त यार मिल बैठे थे। हँसी ठिठोली गाना बजाना हुआ। 

जब सारे मेहमान चले गए और सब सो गए तब मैं और वो(तुम्हारे पापा) छत पे कुछ पल साथ बिताए। 

ऐसे क्या देख रहे हो ? 

कुछ नहीं। बस सोच रहा हूं कि तुम न होती तो मैं और मेरी जिंदगी कैसी होती। पता नहीं मैं शायद थोड़ा खुशनसीब हू जो मुझे तुम मिली। मेरी जिंदगी में आने का बहुत बहुत शुक्रिया।

और एक गुलाब का फूल मुझे देकर बहुत ही प्यार भरे अंदाज़ में मोहब्बत को जाहिर किया। 

मेरी खुशी का ठिकाना न था। ऐसे लम्हे बहुत मुश्किल से ही तो मिलते थे हमे। काश इन लम्हो का सिलसिला चलता ही रहता। मगर फिर मेरी खुशी के पलों के बीच एक और दरार उभर आई जब उन्होंने बताया कि,

"शैलू , मुझे कल सुबह वापस जाना है। केम्प से ख़त आया है एक इमरजेंसी के तहत मेरी छुट्टी कैन्सल हो गयी है। "

क्या ?

क्या कहा तुमने ? तुम 

तुम वापस ..।

"दरअसल ये ख़त मुझे कल शाम ही मिल चुकी थी मगर मैं तुम्हारा जन्मदिन खराब नही कर सकता था। आई हेव टू लीव ..।"

मेरी मुस्कुराती आंखें खामोश हो गयी। मैंने दो टक उसकी आँखों में देखा। 

तुम हमेशा ऐसे ही करते हो। अभी अभी तो आये थे अब फिर.. दो पल के लिए आ कर फिर चले जाते हो। मत जाओ न .. 

मेरी आँखें नम हो चली थी आवाज़ भी भारी हो गयी थी।

"मैं फिर आ जाऊंगा शैलू। लेकिन अभी मुझे जाना ही होगा। मुझे मुस्कुरा कर रवाना कर। रोती शक्ल से रवाना करेगी तो वापस नही आऊंगा।"

चुप। ऐसा मत बोलो।। 

अपने आंसुओ को पोछते हुए मैंने खुद को एक बार फिर संभाला हमेशा की तरह। अगली सुबह हमने उन्हें विदा किया। 

उन्होंने मुझे गले लगाया मेरे माथे को चूमा और कहा,

अपना और सबका का ख्याल रखना। मैं जल्द लौट आऊंगा और इस बार लंबी छुट्टी लेकर। 

वो अपनी सीट पे बैठ गए और ट्रेन स्टेशन से हिलने लगी। वो खिड़की में से हाथ हिलाते रहे और मैं उन्हें तब तक देखती रही जब तक वो मेरी नज़रों से ओझल न हुए।

उस वक़्त मुझे क्या पता था कि ट्रेन नही मेरी जिंदगी जा रही थी जो कभी वापस नही आने वाली थी। उन्होंने अपना हर वादा निभाया था बस वापस आने का वादा निभा न पाए। वो वापस नही आए तिरंगे में लिपटा उनका पार्थिव शरीर आया। 

इतना कहते हुए शैलजा की पलकों से आंसू छलक चुके थे। रौनक भी अपने पिता की याद में तड़प उठा था। 

फिर जैसे तैसे मैंने जिंदगी को चलाया। जितना हो सका किया। खुद को और तुम लोगों को संभाला। 

वो रात आखरी रात थी मेरी उनके साथ और वो गुलाब भी आखरी था।

जब भी कहती थी कि वादा करो सही सलामत लौट के आओगे तो कहते थे:

" शैलू किसी को भी मौत की तारीख मालूम नहीं होती है मगर जीते जी कभी मर मर कर जीना नहीं चाहिए। जब तक सांस चल रही है तुम जिंदा हो और जब तक जिंदा हो तब तक संघर्ष होता ही रहेगा इसलिए मुस्कुराकर जियो और अगर मैं बेवक़्त चला जाऊं तो भी किस्मत या ऊपरवाले से कोई नाराज़गी या शिकायत मत रखना क्योंकि जब तक तुम रहोगी तब तक मैं तुममें जिंदा रहूंगा।"

इतना कहते हुए शैलजा खामोश हो गयी। 

रौनक ने माँ की और देखा। 

शैलजा की आंखें बिना झपकी के खुली ही रही और पलकों के किनारों से आंसू की लकीर खिंच गयी।

खुली आँखों के साथ शैलजा कभी न खुलने वाली नींद में डूब गई।

अगली सुबह रौनक ने आपनी माँ की आखरी तमन्ना पूरी की। अलमारी में रखे लाल रंग के बॉक्स को बाहर निकाला। उसमें दर्जनों खत दबे हुए थे और उस पर एक फीकी पड़ी गुलाब रखी हुई थी। ये तमाम खत शैलजा के पास अपने पति के प्यार और एहसासों के धागे के समान थी। इन्हीं एहसासों को सीने से लगा कर शैलजा न अपना पूरा जीवन काट लिया था। रौनक ने बॉक्स को खतों और गुलाब समेत देह संस्कार में शामिल कर अपने पिता के आखरी यादों को अपनी माँ के चिता में समाहित कर उन्हीं के साथ रवाना कर दिया।


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