आदर्श पत्नी
आदर्श पत्नी
जब'भगवान श्रीराम' को पत्नी कैकई के कहने पर पिता दशरथ वन जाने की आज्ञा देतें हैं ,तो प्रभु श्री राम पिता के आदेश का अनुपालन करते हुये वन जाने के लिए खड़े हो जातें हैं, और अपने सभी गुरुजनों, मंत्रि परिषद के लोग, प्रजाजनों तथा परिजनों से मिलने और अंतिम आज्ञा लेने के लिए जातें हैं। यह भी राजा का एक नियम है ,वह अपनी इच्छा से कुछ नही कर सकते हैं, उन्हे अपनी प्रजा ,गुरुजन ,परिवार के सभी सदस्य आदि से आज्ञा प्राप्त करना होता था। और श्री राम तो मर्यादा पुरुषोत्तम थे ,वह भला इस नियम के विरुद्ध कैसे जाते।
क्रमानुसार प्रभु राम सर्व प्रथम अपनी जननी माता के पास जातें हैं, और माता से अपने बनवास की बात कहतें हैं। माँ यह सुन शोकमग्न हो जाती हैं।
उसी समय अनुज लक्ष्मण भी वहां उपस्थित थे, और दोनों राम से कहतें हैं, वन न जाओ। लक्ष्मण तो ये तक कह देते हैं कि आप मेरी सहायता से राज्य का शासन बलपूर्वक अपने हाथ में ले लीजिये।
शोक में डूबी माँ कौशल्या लक्ष्मण की बातों का अनुमोदन करती हैं और दोनों श्रीराम को उनके धर्म का पालन करने से रोकना चाहते थे। प्रभु श्री राम किसी तरह उन्हें समझा-बुझाकर वहां से निकल जाते हैं तो पुनः लक्ष्मण उनको कई तरह से समझाने की प्रयास करतें हैं ।
मगर धर्म का पालन करने और कराने हेतू धरती पर अवतरित भगवान उनकी बात नहीं मानते। राम वन जाने से पूर्व जिस-जिस के पास भी जातें हैं सब राम से यही कहतें हैं कि*" राम ! तुम वन न जाओ और अयोध्या का शासन अपने हाथों में ले लो।
सारी प्रजा, सारे गुरुजन, सारे मंत्रियों में से कोई भी नहीं था जिसने राम से ये कहा हो कि तुम अयोध्या के महाराज दशरथ की इस आज्ञा का अनुपालन करो और पिता की आज्ञा का पालन कर धर्म के रक्षक बनो।
वनवास पूर्व श्रीराम को उनके धर्मपथ और कर्तव्य-पथ से विरक्त न करने वालों में एक ही नाम था और वो नाम था उनकी भार्या "जानकी" यानी सीता माता का।
प्रभु श्री राम जब अपनी पत्नी को अपने वन जाने की आज्ञा के बारे में बताते हैं तो वो एक बार भी उनसे नहीं कहतीं कि आप पिता और माता की आज्ञा का उल्लंघन कर दो और बलपूर्वक शासक बन जाओ। धर्म-मार्ग और कर्तव्य-पथ की ओर कदम बढ़ा चुके श्रीराम को एक बार भी वो अपने फैसले पर पुनर्विचार करने को नहीं कहतीं बल्कि सीधा उनसे कहतीं हैं ,
"हे आर्य पुत्र ! पिता, माता, भाई, पुत्र और पुत्रवधू - सब पुण्यादि कर्मों का भोग भोगते हुये अपने-अपने भाग्य के अनुसार जीवन-निर्वाह करतें हैं।
हे पुरुषवर ! केवल पत्नी ही अपने पति के भाग्य का अनुसरण करती है; अतः आपके साथ ही मुझे भी वन में रहने की आज्ञा मिल गई है।
हे रघुनंदन ! यदि आप आज ही दुर्गम वन की ओर प्रस्थान कर रहें हैं तो मैं रास्ते के कुश और काँटों को कुचलती हुई आपके आगे-आगे चलूंगी।"
उस काल के दो महान साम्राज्य जनकपुर और अयोध्या की बेटी और बहू 'सीता' वनवासी वस्त्र धारण कर नंगे पांव पति की सहचारिणी बनकर वन गामिनी हो गई और दुनिया में स्वयं का नाम श्रीराम के साथ अमर कर लिया।
सीता मां ने केवल अपने पति के लिये वनवासी जीवन को चुना था जबकि श्रीराम, दशरथ और सारे अयोध्यावासी उनसे अयोध्या के राजमहलों में रहने के लिये कह रहे थे।
सीता मां ने केवल अपने पति के लिये असीम कष्ट उठाये। जानकी धर्म रक्षण का संकल्प लिये अपने पति के राह की बाधा नहीं बनी बल्कि उनकी सहयोगी बनकर रही।
किसी कारणवश राम को सीता का परित्याग करना पड़ा पर जानकी ने न तो अपने पति के लिये और न ही अपने किसी ससुराल वाले के लिये कभी कोई कटु वचन कहे बल्कि अपने पुत्रों लव और कुश को राम का पावन चरित ही सुनाया।
आज सीता मां को इस धरती को त्यागे हुये लाखों वर्ष बीत गये हैं पर 'पत्नी रूप में नारी' की अन्यत्र मिसाल विश्व 'सीता' के अलावा खोज नहीं पाया है।
महान विश्व गुरु'स्वामी विवेकानन्द' कहते थे कि भारत की हर बालिका को सीता जैसे बनने का आशीर्वाद दो। हिन्दू जाति को सबसे अधिक गौरवशाली वो इसलिये मानते थे क्योंकि हममें सीता पैदा हुई थी।
श्रीराम को ऐसी ही पत्नी तो मिली थी जो अपने पति के मन को पढ़ने वाली, उनके इच्छा के अनुरूप आचरण करने वाली और उनके मन के अनुकूल स्वयं को ढ़ालने वाली थी। धर्म पालक श्रीराम वन जायेंगें ही और उनको उनके इस निश्चय से डिगाया नहीं जा सकता ये बात जानकी के सिवा कोई नहीं जानता था इसलिये जानकी ने उन्हें एक बार भी रुकने को नहीं कहा बल्कि स्वयं उनके साथ वन के कष्टों को सहने को तत्पर हो गईं।
इसलिये "सीता-राम की जोड़ी" लाखों वर्षों से 'दाम्पत्य के सबसे सुखद जोड़ी' का पर्याय बनी हुई है और जानकी भारत की महान नारियों में अग्रणी हैं,।
जिनके सम्मान की रक्षा के लिए नर से लेकर वानर और वनवासी से लेकर जटायु जैसे पक्षी तक बलिदान को उपस्थित हो जाते हैं।
