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Dr Manisha Sharma

Abstract


5.0  

Dr Manisha Sharma

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ज़िन्दगी की दौड़

ज़िन्दगी की दौड़

1 min 482 1 min 482


ज़िन्दगी की दौड़ अजीब सा खेल है

हार और जीत का अजीब सा मेल है ।

भागती है कभी तो कभी थम जाती है

ना जाने कैसी दुनिया की रेलमपेल है । । 


  किसी के सपनों में ऊँची उड़ानें हैं

  किसी के अपनों में सिमटे ज़माने हैं।

  कोई पैसा चाहे, कोई चाहे प्यार

  यहाँ पर सभी के अपने पैमानें हैं । ।


कोई इस जहाँ में मस्ती से झूमे

किसी की ख्वाहिश आसमां को चूमे ।

जितने हैं चेहरे उतने ही तराने हैं

बदलती है तस्वीर ज्यूँ ही वो घूमें । ।


  है कोई यहाँ पर बड़ा एक खिलाड़ी

  है कोई जहां की अदा से अनाड़ी ।

  मगर ज़िन्दगी सबकी चलती यहाँ पर

  कभी एक अगाड़ी कभी एक पिछाड़ी । ।



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