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ravinder kumar

Abstract

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ravinder kumar

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ज़िन्दगी का असली रुप

ज़िन्दगी का असली रुप

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दिख गया ज़िन्दगी का असली रुप कोरोना दर्पन से

टूट गया सारा अहंकार अपने स्वरूप दर्शन से ll


दिमाग पे बोझ उठाकर घूम रहा रोटी की एक थाली के लिए

अब पता लगा मोहताज नहीं जीवन विलास्तापूर्ण शैली के लिए ll


समय नहीं था जिसके पास अपने परिवार के साथ बिताने के लिए

परिवार के साथ दुवक के बैठा है आज अपने प्राण बचाने के लिए ll


परिन्दा बनकर उड़ रहा था हवा महल वनाने के लिए

अब पता लगा पिंजरा ही ठीक है जीवन बचाने के लिए ll


कभी समय ना मिलता था ज़िसे क्रतब्य पालन से

अब सोच रहा कब आजाद हूँगा इस घरेलू शासन से ll


दिख गया ज़िन्दगी का असली रुप कोरोना दर्पन से

टूट गया सारा अहंकार अपने स्वरूप दर्शन से ll


जो भी हो रहा ये सब देख कर मै बहुत चिंतित हूँ

बुरे कर्मो का फल सामने देख मैं खुद ही निन्दित हूँ ll


कर रहा इंतजार तुफान भरी वारिश के आने का

धुल जाए जल्दी से सारा दुख इस जामाने का ll


पता है मुझे भगवान के घर मे देर है अंधेर नहीं

गुजारिश है ईश्वर से बुरे कर्मो का कर दे डेर यहीं ll


नहीं खिलवाड़ करेंगे अब हम जीवन रूपी इस उपवन से

हाथ जोड़कर कर रहे विनती, शुरू करेंगे ज़िन्दगी अंत्रमन से ll


दिख गया ज़िन्दगी का असली रुप कोरोना दर्पन से

टूट गया सारा अहंकार अपने स्वरूप दर्शन से ll




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