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Sudhir Srivastava

Abstract

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Sudhir Srivastava

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यमराज मित्र के दोहे

यमराज मित्र के दोहे

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दोहा छंद ******* डूबे सब  निज  स्वार्थ में, झूठी  तेरी  आस। अब तो लगते हैं सभी, सड़ी हुई सी घास।। सावधान रहिए सभी, और संग में ध्यान। डूबे सब निज स्वार्थ में, झूठा है सम्मान।। चाहे दे दो प्राण भी, इनकी खातिर खास। डूबे सब निज स्वार्थ में, देंगे केवल त्रास।। बादल छाए संदेह के, अब रिश्तों  के बीच। घटनाएं जो घट रहीं, हँसती इसको सींच।। अब  मानव  संदेह  से,         कैसे  होगा  दूर। नहीं पता चलता उसे, किस पल वो मजबूर।। सत्य सनातन धर्म पर, जो करते संदेह। कैसे हम इनसे करें, अपनेपन का नेह।। समय-समय की बात है, समय मित्र यमराज।  अगर  समय दे  कष्ट तो, करिए  उल्टे  काज।। दीवाना होना नहीं,  बिना  किसी आधार। वरना होगे हम सभी, बिना नाव पतवार।। वीराना सा लग रहा, अब तो घर परिवार। मोबाइल के दौर में, छिनता प्यार दुलार।। धरना दें जब  सत्य हित, तब  गूँजे  आवाज। सत्ता शासन भी करे, तब खुलकर परवाज़।। जब   प्रदर्शन   हो   कभी,  भीड़  बने  तलवार।   बिना लड़े मिलता नहीं, निज का ही अधिकार॥ अब अनशन  के नाम पर, होते हैं  बहु खेल। जनता नाहक बन रही, बिन इंजन की रेल।। यदि  अंधा  कानून  हो, तो बढ़ता  अन्याय। निर्बल और गरीब जो, वह होता असहाय।। चिंता फल  की क्यों करें, यह ईश्वर  का काम। धीरज से मिलता सदा, अंत सुखद परिणाम।। ध्वस्त आजकल हो रहा, अब समाज परिवेश। चिंता  है  इस  बात  की,    देख  रहे अवधेश।। सत्ता के हथियार का, उचित  सदा उपयोग।  नहीं दंभ में  हो कभी, जो  बन  जाए रोग।। कुछ लोगों के हाथ में, सत्ता का अधिकार। मान रहे वो  लोग हैं, नीति नियम  बेकार।। सत्ता  का  अधिकार  है,  लोकतंत्र  के  नाम। हर प्राणी को चाहिए, सुख-समृद्धि आयाम।। यदि  हाथों  में  आपके,   सत्ता  का  अधिकार। पूरा करिए कर्तव्य निज, बिना किसी तकरार।। नेता जी पर चढ़ गया, आज रावणी भूत।  फिर भी खुद को मानते, रामभक्त अवधूत।। नहीं   रहेगा   दबदबा,  झूठा   राग  अलाप।   राम नाम की ओट में, फिर क्यों करते पाप।। खुदा स्वयं को समझना, होगी भारी भूल। आने  वाला है  समय, बन जाओगे धूल।। अहंकार ही एक दिन, कारण  होगा डूब।  इसीलिए वो हर कहीं, बोल रहे वो खूब।। अहंकार  का  दबदबा, भले रहा  फल फूल।  पर निश्चित यह मानिए, जल्द मिलेगा धूल।। खेल  खिलाड़ी  खेलते, सब  अपने  मैदान। सिर्फ जीत की चाह में, लगा रहे गुरु ज्ञान।। राजनीति के खेल का, सहज नहीं मैदान। सभी खिलाड़ी चाहते, मूँदे अपने कान।। खेल खिलाड़ी को मिले, समुचित सुविधा मान। खेलें   वे   मैदान   में,      नहीं   चाहते   दान।। अपने-अपने  कर्म  का,      फल   पाते   हैं  लोग। सुख-सुविधा सबको नहीं, कुछ को मिलता रोग।। निज पर यदि विश्वास हो, तभी सफल हो कर्म। ईश कृपा  उसको मिले, जिसने  समझा  मर्म।। सब अपने ही कर्म को, कहते पाक पवित्र। नहीं चाहते और  का, दुनिया  देखे  चित्र।। सबको अपने कर्म का, होता  बड़ा  गुमान। होता है हर एक को, अपनी खुद पहचान।। युवा भटककर  जा रहा, आज गर्त  की ओर।  फिर  भी खूब मचा रहा,  झूठ-मूठ का शोर।।              आज  युवा  विश्वास  से,   होता  है  लबरेज।  दुनिया जितना सोचती, उससे ज्यादा तेज।। मातु जानकी आज भी, देती जन को सीख। मर्यादा  की  आड़  में, नहीं  माँगना  भीख।। हर नारी  हो जानकी, चाह रहे  हम लोग। और बिना संकोच के, बाँट  रहे हैं  रोग।। सभी  दबाना  चाहते,  जो  होता  कमजोर। जिनके मन की कामना, वही रहें सिरमौर।। सिर्फ कुचलना आपकी, नियत नहीं है मित्र। आज जगत बदलाव के, खीँच रहा है चित्र।। धीरे-धीरे   घट   रहा,       मर्यादा   संस्कार।  सबको केवल है पता, करना बस तकरार।। अब परिजनों के मध्य में, फैल रहा संदेह। धीरे-धीरे  घट  रहा,    आज   आपसी   नेह।।   धीरे-धीरे  घट  रहा,     मानवीय   परिवेश। स्वार्थ सिद्धि की भावना, भुला रहे हैं देश।। लहजा आप संभालकर, करना  कोई बात। वरना निश्चित आपको, खाना  जूता  लात।। जो गरजा बरसा नहीं, जाने सकल जहान। अपने मुँह मिट्ठू मियाँ, नहीं बघारो ज्ञान।। छह गज में  लिपटी हुई, नारी का अभिमान।  लाज शर्म संकोच में, संस्कृति की पहचान।।  लहराता  पल्लू  जहॉं,      बहे  बयार  सुगंध। नारी साड़ी का अगर, हुआ सुखद अनुबंध।। उत्सुक  रहकर जो सदा, बढ़ता अपनी राह। जीवन में मिलता उसे,   नित नूतन उत्साह।। इतना ही उत्सुक नहीं, होना हमको मित्र। पहले  आए  सामने, तभी दिखेगा चित्र।। राजनीति का खेल अब,   खेले पक्ष विपक्ष। सब अपना हित साधते, जिसमें जो है दक्ष।। राजनीति के खेल में, वादों की भरमार। सत्ता आती  हाथ में, करते  हैं  बेजार।। राजनीति का खेल है, धरने  का षड्यंत्र। नहीं  फिक्र है छात्र की, ढूंढें कुर्सी मंत्र।। नव  पीढी़  है  झेलती,   राजनीति  का  दंड। समाधान नहिं चाहते, झूठ विरोध का झंड।। राजनीति  के खेल  में,   बिगड़ रहा है तंत्र। उड़ा रहे मखौल हैं,  सिसक रहा जनतंत्र।। मातृ भूमि के नाम से, बढ़ता अपना मान।   सीस झुकाएँ नित्य ही, करें वंदना ध्यान।। मातृ भूमि  सबसे  बड़ी, देती  सबको  सीख।  धरती माँ की गोद में, सुखदा जीवन  दीख।।                                                 त्याग तपस्या से लिखी, मातृ भूमि की शान।   वीरों  ने  सींचा  इसे,   अपने  लहू  समान।।  मातृ भूमि के कर्ज से, यदि होना  उद्धार। जीना इसके नाम पर, संग मृत्यु का सार।। नहीं व्यर्थ उपकार का,    करिए आप प्रपंच। चर्चा तक इसकी कभी, नहीं  कीजिए मंच।। रोग  बहुत  अब  बढ़  गए, कैसे  हो  उपचार। प्रभु  जी  जैसा  चाहते,   चलता  है  संसार।। नहीं  जताना  चाहिए,  उतरन  दे  अहसान। इससे बढ़ता है नहीं, कभी किसी का मान।। उतरन में यदि भाव हो, देता बड़ा सूकून। मानवीय संवेदना,   खुशियां करती दून।। सत्य  बोल  मीठा  लगे,    मन  को  देता  धीर।  कड़ुआ सच भी समय पर, चमका दे तकदीर।। जिसने भी समझा नहीं, जीवन का जो मर्म। उसके दिलो-दिमाग की, बत्ती  रहती  गर्म।। रिश्तों का भी मर्म है, कहाँ समझते लोग। इसीलिए तो बढ़ रहा, कटुता ईर्ष्या रोग।। साधु-संत संगति मिले, तब हो मर्म का बोध। गुरु वाणी से सीखिए, व्यर्थ न  करिए शोध।। नियमों की अब पालना, बनती जाती खेल। निर्धन अरु  कमजोर जो, बने  घूमते  रेल।। आज  नियम  कानून  से,   डरते  हैं  कमजोर। जन प्रतिनिधि मचा रहे, इसकी आड़ में शोर।। चाहे जितना नियम का, करें लोग सम्मान। भ्रष्टाचारी  धारणा,    करवाती  अपमान।। नीति नियम सब व्यर्थ है, बिना  मान  सम्मान।  उड़ता रहता नित्य ही, किसको इसका ध्यान।। जितना भी कोशिश करें, फिर भी हैं मजबूर। होता  कम है  आहरण, भाग्य  हमारा  क्रूर।। राशन वितरण आड़ में, घटतौली का खेल। भ्रष्टाचारी  माफिया, चला  रहे  निज  रेल।। लगती  नहीं  लगाम  है, कैसे कहते आप। पहले  करके  देखिए, कंठी माला  जाप।। नाहक  ही  हम  आप  तो,    होते  हैं बदनाम। जिन पर लगनी चाहिए, उन पर नहीं लगाम।। अपने  भीतर  खोजिए,   एक  नई  पहचान।  सतगुरु का सद्ज्ञान ही, जीवन का विज्ञान।। आज  हमारे  बीच  में, घटता  शंख  महत्व। नव पीढ़ी नहिं जानती, इसका तत्व घनत्व।। सविता से हम सीख लें, समय पालना आज। पूरा होगा आपका, बिन तनाव  सब  काज।। सारी  दुनिया  हो  रही, सविता से उजियार। तभी धरा पर चल रहा, प्राण जगत संसार।। सोच समझकर आज क्यों, भटक रहा इंसान। कोई  सिखलाता  नहीं, जीवन  का  विज्ञान।। भटक  रहा  इंसान  है,    होता  जाता  दीन। भले नहीं उसको पता, बजा रहा क्यों बीन।। खेल समझकर भूलना, लाता मुश्किल दौर। भटक  रहा  इंसान  जो, करे  देर  से  गौर।। भटक  रहे  इंसान  का, बस  इतना है दोष। आता उसको है नहीं, सही समय पर रोष।। बातचीत   मिश्री   घुली,    छोड़   दंभ   अभिमान।  दिल से दिल मिल जाय तो, हर मुश्किल आसान।।  युवा वर्ग है देश का, कल का  सुखद भविष्य।  कदम बढ़ाता जोश में, जस  उर्जा  आदित्य।।  समाधान की  राह में, धीरज  का है  सार। सोच समझ आगे बढ़ो, बना रहेगा प्यार।। श्रम से मिलती जीत है, व्यर्थ हार की सोच।  विचलित होना  है नहीं, छोटी-मोटी  मोच।।  आप  नतीजा  सामने, जैसा  होगा कर्म।  बीजारोपण सत्य का, मीठा मानव धर्म।। मिलती उसको ही विजय, जिसका होता लक्ष्य। मंजिल  पाने  के  लिए,    चलता  रहता  रक्ष्य।। सिर्फ सोचने से नहीं, मिले विजय का छोर। सतत करे जो साधना, पकड़े  रहता  डोर।। हार-जीत  को  भूलकर,  जो  करता  है  काम।। विजय तिलक उसको मिले, संग नया आयाम।। विजय  पताका  चाहती, श्रद्धा  अरु   विश्वास। इसके बिन मिलता नहीं, मत रख झूठी आस।।  गीत मेघ मल्हार अब, सुना रही  बरसात।  भीगी धरती की सुनो, राग मधुरता गात।। चित चिंतन  में  भी  लगे, हो  जीवन  का सार। नैतिक बल के साथ ही, उचित प्रेम  व्यवहार।। धीर   वीर   गंभीरता,      मानव   का   बोध। करना अपने आप से, हम सबको ही शोध।। चाल-काल की कब भला, समझ सका है कौन। चाहे  जितना  ज्ञान  हो,   रहना  पड़ता  मौन।। आज मनुज ही बन रहा, अब अपनों का काल। जो जितना  जतला रहा, वही  खींचता  ढाल।। काम सतह पर दिख रहा, नहीं देखते आप। यही बात तो खास है, मन में  बस संताप।। सिर्फ बात से हो नहीं, कभी सतह पर काम। बिना सत्य संकल्प के, कहाँ  रचा  आयाम।। त्याग पत्र को मानना, काकरोच की जीत। मूरख  हैं  वे  लोग  सब, गाते भौंड़ा गीत।।  सोच-समझकर हो गया, त्याग पत्र का खेल।  नहीं  पता  जो  मगन  हैं, आने  वाली  रेल।। कैसे अपने जाल में, उलझ गये वो लोग। जो कल तक थे सोचते, हम देते हैं रोग।। सत्ता दल के जाल में, कैसे फँसा विपक्ष। आया उनके सामने, खड़ा प्रश्न बन यक्ष।। मौन भले संकेत है, पर उसका भी अर्थ। नहीं समझता जो इसे, झेले बड़ा अनर्थ।। भले  समझते  हम नहीं, युवा  वर्ग संकेत। इसका प्रतिफल झेलते, रंग बदलती रेत।। समाधान की खोज में, भटक  रहे  हैं लोग। भले भटकना व्यर्थ हो, नहीं समझते रोग।। समाधान यदि चाहते, सुनो ध्यान से बात। नहीं भावना हो हृदय, करना है प्रतिघात।। ओछी   हरकत  जो  हुई, बेशर्मी के साथ। जो भी करना कीजिए, पहले बाँधो हाथ।। जैसी हरकत हो रही, जगह-जगह हर रोज। जैसे उनके  बाप हैं, मुफ्त  खिलाते  भोज।। जैसी  हरकत  कर  रहे, लाज  शर्म को  भूल। मित्र  श्राप  है  दे  रहा, जल्द  मिलोगे  धूल।। हरकत के अनुरूप ही, निश्चित मिलना दंड। हो जाओ  तैयार तुम, सहो  खंड  ही  खंड।। ******** सैनिक ****** सीमा पर  सैनिक खड़ा, रखता देश  की लाज। धूप छाँव की फ़िक्र बिन, करता अपना काज।।  घर का सब सुख छोड़कर, सीमा पर है जाग। नींद  बेच  सैनिक भरे, दुश्मन  सीना  आग।।  माथे   टीका   वीरता,      रहता   सीना    शान। सैनिक बल पर है टिका, भारत का अभिमान।।  सीमाओं के  ये  प्रहरी, आँख भरे अंगार। दुश्मन आवे  लाख भी, कर  देते  संहार।।  सैनिक तन गलता यहाँ, लगा खुशी को दाँव। हम  सोते  हैं  चैन  से,  ये  सीमा  की  ठाँव।।  सैनिक जन का हम सभी, करते जय-जयकार। उसके  बल पर  ही टिका, देश  और  परिवार।।  ******* पुरी रथयात्रा  ******** होती  जय-जयकार  है, जगन्नाथ  सरकार। निकल पड़े रथ बैठकर, उल्लासित संसार।। रथयात्रा  रथ खींचकर, पुण्य कमाते लोग। जगन्नाथ प्रभु जी हरें, भक्त जनों के रोग।।ं रथयात्रा  रथ  थामकर, कहें  मित्र  यमराज। जगन्नाथ प्रभु दीजिए, सेवा अवसर आज।। गुड़िचा में नौ दिन प्रभो,  बसें भक्त के साथ। तरसे  दर्शन  को  जगत, जोड़े  दोनों  हाथ।।़ रथ यात्रा  की  वापसी,  बजे  शंख  औ  ढोल। जगन्नाथ फिर आ रहे, भक्त खिले  अनमोल।। जगन्नाथ   प्रभु   कीजिए, आप   जगत   उद्धार। जन-मन सब खुशहाल हो, आपस में हो प्यार।। ******** बिन वर्षा सूखी धरा  ********* बिन वर्षा सूखी धरा , कृषक सभी बेचैन। कैसे  रोपें  धान  वो, अश्रु  बह  रहे नैन।। बिन  वर्षा  सूखी  धरा,   जीव  जन्तु  बेहाल। सबको ऐसा लग रहा, बहुत निकट है काल।। बिन वर्षा  सूखी  धरा , नहीं इंद्र  को ध्यान। समझा सकता कौन है, उन्हें धरा विज्ञान।। बिन  वर्षा  सूखी  धरा,    गुस्से  में  यमराज। इंद्रदेव से कह रहा, करो तनिक अब काज।। इंद्रदेव  क्या  आजकल, कर  बैठे  हड़ताल। मोदी जी कुछ कीजिए, वरना व्यर्थ बवाल।। मौन साधकर बैठना, यदि जीवन का सार। कहते  हैं  यमराज  जी,  जीना  है बेकार।। मौन  साधकर  बैठिए,  देखो जब अन्याय। बना यही सिद्धांत लो, करते हो क्यों हाय।। बैठे  हैं  जो  मौन  में, करते  नहीं  विचार। मानवता के धर्म का, भूल गए क्या सार।। रिश्तों में विष फैलता, कब समझेंगे लोग। आज यही सबसे बड़ा, मानवता में रोग।। कब समझेंगे लोग अब, नहीं रहे क्या सोच। अपने सब दुश्मन लगें, यह कैसा है लोच।। रिश्तों के अपमान को, मत कहिए संयोग। पूछ रहा यमराज भी, कब समझेंगे लोग।। ******** दान चोर  ******** दान चोर का  आप क्यों, उड़ा  रहे  उपहास। उसको तो अंतिम यही, एक मात्र थी आस।। जान रहे हैं  राम जी, दान चोर  का नाम। मगर चाहते हैं नहीं, लटके उसका काम।। दान चोर  तो कर  रहा, केवल  अपना  कर्म। बिन समझें हम आप क्यों, देख रहे हैं धर्म।। दान चोर भी भक्त है, समझ  लीजिए आप। नाहक ही बदनाम कर, नहीं करो तुम पाप।। दान  चोर  हूँ मैं  मगर, चिंता  में क्यों  आप। पहले जाकर कीजिए, राम नाम का  जाप।। ******* अनुशासन ********** समय पालना  जो  करे, रखे  वचन  की  लाज।   अनुशासन हो द्वार पर,  करता  सदा  विराज॥ अनुशासन की नींव पर, अटका है  संसार।   जो तोड़े इस नींव को, गिरे धरा  के  पार।। अनुशासन  में तुम  रहो,  मान  स्वयं  आधार।   अपनाता  है  जो  इसे, पाता  जग  में  प्यार॥ नियम  धर्म  को  मानिए,  यही  सिखाता  ज्ञान।   अनुशासन बिन मनुज का, बेबस बने  विधान॥ नियम  धर्म  को  मानना,  अनुशासन का ज्ञान।   इसके बिन सब व्यर्थ है, मानव  रचित विधान॥ अनुशासन के संग ही,   जीवन  बने  महान।   बिना नियम के जो चले, सहता है नुकसान॥ काम समय पर कीजिए, निज अनुशासन मान।   आलस तज कर जो चले, बने अलग पहचान॥ विद्या धन अनुशासन में , सीधा साधा मेल।   एक  बिना  दूजा  सदा, हो जाता  ह फेल॥ ******** धर्म  ******** कहाँ किसी के धर्म का, होता है अपमान। जब तक होता है नहीं, धर्म मर्म का ज्ञान।। धर्म न  पूजा-पाठ में, धर्म न  तीर्थ पठार।   धर्म वही जो सभी से, करे प्रेम व्यवहार।। धर्म धरे जो सत्य का, मन करुणा का वास।   मानवता ही धर्म है,  बाकी सब  बकवास।।  बैर बढ़े  जिस  धर्म से, उसे मिले  कब मान।   मेट सके जो पीर को,  उसकी हो पहचान।। स्वार्थ लोभ के मुक्ति से,  मन निर्मल जस गंग।  जन-मन  सेवा  भावना,  धर्म -कर्म  का  रंग।। ******** समय ******** उचित समय आता मगर, रखना पड़ता धैर्य। मिले सुखद परिणाम भी, नहीं ठानिए बैर्य।। जीवन धारा  में बहो, समय सदा  दे साथ। बाधाओं से हारकर,  नहीं  छुड़ाओ हाथ।। अपनी  जैसी  जिंदगी,    करो  आप  स्वीकार। समय हाथ में सौंपकर, भूलो निज अधिकार।। अपनी गति से ही चले, समय नियति रफ्तार। हमको करना अनुसरण, बिन  माने  बेकार।। नहीं समय के साथ तुम, करो व्यर्थ तकरार। अच्छा होगा मानिए, आप समय  आभार।। ******** तिरंगा  ********* एक  सूत्र  में  बाँधती,   तीन  रंग  की  डोर। हाथ तिरंगा थामकर, चलें प्रगति की ओर।। केसरिया रंग त्याग का, श्वेत शांति पहचान। हरा  रंग  समृद्धि  का, धर्म  चक्र  पहचान।।  हाथ तिरंगा शान से, बसा हिंद का मान।  लहराता है गर्व से, विश्व पटल पहचान।।  सीमाओं  पर शान से, वीरों  की  पहचान।  आज तिरंगा विश्व में, नूतनता अभिमान।।  झुकने  पायेगा  नहीं, कभी  तिरंगा  शान।  भारत का गौरव यही, संग हमारी  जान।। ********* हरियाली हर ओर  ********** केवल चाहत से नहीं, हरियाली हर ओर। वृक्षारोपण  संग  में, होना  चहिए  शोर।। हरियाली  हर  ओर  अब,     आया  वर्षा  दौर।  सब मिलकर कोशिश करें, थोड़ी-थोड़ी और।। हरियाली भी डूबती, जल प्लावन  में खूब। शेष आज दिखती नहीं, पहले वाली दूब।। हरियाली  हर  ओर  का,      नारा  है  बेकार। जब तक होंगी ख्वाहिशें, करे सिर्फ सरकार।। घर  मकान  के  संग  में, खेत और  खलिहान। हरियाली की व्यथा से, हम सब क्यों अंजान।। आँगन द्वारे पेड़ लगाना, बहु सुख देगा मीत।  फल लकड़ी छाया मिले, तब गाएँ हम गीत।।  बरगद की जो छाँव है, रोपें बीज का सार।  बेटे जैसा पालना,  तभी मिला अधिकार।। ********* सावन ********** घन घमंड  में  गरजते, बरसे मेघा  झार।   धरती ओढ़े चूनरी, हरियाली  का  सार॥ सावन की बूँदें गिरें,  हृदय पिया की याद।   बिन देखे नहिं चैन है, करे मौन फरियाद॥ हाथों में  त्रिशूल है, गले  नाग  का  हार।   काँवड़िए हैं झूमते, जल अर्पण सत्कार॥ झूले  पेड़ों  पर  पड़े,     रही  गीत  गा  नारि।   सावन का आया समय, सखियाँ जाएनं वारि॥ काली  बदरी  छा  गई, मन  में  उठती  हूक। प्रियतम घर आ जाइए, सावन में मत चूक॥ ********* सबके राजा राम  ********* सबके राजा राम हैं, करिए  कोई  काम। ऐसा आया  दौर है, लगती  नहीं  लगाम।। दुनिया कहती प्रेम से, बड़ा राम से नाम। महिमा भी तो जानते, सबके राजा राम।। सबके  राजा  राम हैं, जान  रहे  हैं  आप। चोरी जैसे कर्म का, फिर भी करते पाप।। मंदिर में चोरी  किया, दान चोर अब नाम॥ सबके राजा राम हैं, फिर क्यों हम बदनाम।। सरयू पावन तट नगर , नाम अयोध्या धाम । जिसके  राजा  राम  जी, मर्यादा  आयाम।। सबके राजा राम का, चित्रण ललित ललाम। जीवन हो जाए सफल, लेने  भर  से  नाम।। मर्यादा  प्रतिमूर्ति  हैं, सबके  राजा  राम। जो भी लेता नाम है, होते उसके  काम।। *********** राजनीति_हावी_हुई ********** राजनीति हावी हुई, जस अधिनायक वाद। माथा  पकड़े  व्यर्थ  ही, करते हैं फरियाद।। राजनीति  हावी  हुई,  दिखे  सड़क  पर  रोज। छुपते  दूजा आड़ में, सिर्फ स्वार्थ  की खोज।। सत्ता ही अब प्रथम है, बतला रहे  नरेश। राजनीति हावी हुई, पिछड़ रहा है देश।। कैसे-कैसे  हो  रहा, बीच हमारे  खेल। राजनीति हावी हुई, सत्य धर्म बेमेल॥ अब तो घर परिवार में, घुस आया है आज। राजनीति हावी हुई, बिखरन लगा समाज॥ ********** कैसे हो उपचार  ********* नेताओं के दंभ से, जन मानस बेजार । जहर घोलना चाहते,कैसे हो उपचार।। जंतर-मंतर  बन  गया,      नया  युद्ध  मैदान। कैसे हो उपचार  अब, जब सबमें अभिमान।। राजनीति की ओट में, तरह-तरह के खेल। कैसे हो उपचार अब, नहीं किसी में मेल।। संसद  में गतिरोध  का,  कैसे  हो  उपचार। नहीं चाहते लोग कुछ, काम करे सरकार।। धरना अनशन आड़ में, हिंसा का अधिकार। क्या इसका उपचार है, इस पर भी तकरार।। ******** भूले शिष्टाचार  *********** कहते हम कुछ भी रहें, भूले शिष्टाचार।  इसीलिए तो घट रहा, मानवता आधार।।  भूले शिष्टाचार सब, जिसका है परिणाम।  अपने अपनों को करें, आये दिन बदनाम।।  भूले  शिष्टाचार  हम, बाँट  रहे  हैं ज्ञान।  खुद पर देते हैं नहीं, बनते बड़े महान।।  झूठे  शिष्टाचार  का,   नहीं  रहा  अब  ज्ञान।  खुद को हम भूले नहीं, किसने रचा विधान।।  भूले  शिष्टाचार  तो, किया  कौन  सा पाप।  सुबह-शाम तो रोज ही, करते माला जाप।। सुधीर श्रीवास्तव  


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