कुण्डलिया छंद
कुण्डलिया छंद
कुण्डलिया छंद ********* मैंने जिस पर था किया, आँख मूँद विश्वास। उसने धोखा दे दिया, तोड़ हमारी आस।। तोड़ हमारी आस, दिखा दी अपनी रंगत। खीस निपोरे आज, रहा खा पूड़ी पंगत।। कहें मित्र यमराज, भीख ले उड़ता डैने। अब कैसा विश्वास, बहुत झेला जब मैंने।।१२९ योगी - मोदी दे रहे, जनता को बहु भाव। जो हैं आज विपक्ष में, उनको गहरा घाव।। उनको गहरा घाव, नहीं मिले अब मरहम। चिंता करते रोज, दिखे अब कोई हमदम।। हर कोशिश बेकार, बने जाते सब रोगी। मुश्किल गलनी दाल, सामने मोदी - योगी।।१३० मथुरा - काशी की धरा, बोले जय श्री राम। सारा विपक्ष बेहाल है, बिगड़े उनके काम।। बिगड़े उनके काम, सूझता है कब चारा। होता मनु लाचार, मिले नहिं आज सहारा।। कहें। मित्र यमराज, जगत ने देखा मथुरा। मोदी-योगी साथ, देख अब काशी- मथुरा।।१३१ देते हैं उपदेश जो, खुद समझें कब सार। अंतर दिखता साफ है, वाणी अरु व्यवहार।। वाणी अरु व्यवहार, दिखाते खुद को ज्ञानी। चलें नहीं उस राह, याद आती हैं नानी।। कहें मित्र यमराज, आज तक जो नहिं चेते। नित नूतन उपदेश, वही आगे बढ़ देते।।१३२ जितना देते उपदेश हैं, औरों को हम-आप। उतना मानें स्वयं भी, नहीं करेंगे पाप।। नहीं करेंगे पाप, काश हम समझें इतना। हमने बदला आज, रहा दिख खुद में कितना।। कहें मित्र यमराज, सदा जीवन में पिसना। अपने मन की यार, दिखा रहे हम जितना।।१३३ आशय जाने ही बिना, निर्णय लेना व्यर्थ। इससे हो सकता बड़ा, समझो आप अनर्थ।। समझो आप अनर्थ, बात बिन जाने बोले। बिना डोर के कुँआ, भला कब पानी डोले।। कहें मित्र यमराज, सुनो मम बात महाशय। समय-समय पर गूढ़, बहुत होता है आशय।।१३४ आया है कैसा प्रलय, प्राणी हुए अधीर। जाने मन में क्या धरे, आये हैं रघुवीर।। कहें मित्र यमराज, धर्म का ध्वज फहराओ। संकट का है दौर, ईश के शरण में जाओ।। करें कृपा रघुवीर, छँटे तब विपदा साया। प्रलय दिखाने आज, ईश खुद चलकर आया।।१३५ वर्षा रानी जब चली, लेकर मेघ बयार। हर कोना धरती दिखे, लगता ज्यों त्योहार।। लगता ज्यों त्योहार, तपन तन-मन के भागे। नाचे मोर किसान, प्रकृति मुस्काकर जागे।। कहें मित्र यमराज, सुनो अब राम कहानी। जल ही जीवन मूल, गीत गा वर्षा रानी।।१३६ पानी टपके जब गगन, जैसे मोती-हार। सूखी नदियाँ भर चलीं, जागा जीवन-सार।। जागा जीवन-सार, हरित धरती मुस्काई। खेतों में उल्लास, स्वर्ण सी फसलें आई।। कहें मित्र यमराज, आइए वर्षा रानी। बूँद-बूँद से सींच, जगत को दो अब पानी।।१३७ छाई छटा के साथ, आया सावन द्वार। मन हर्षाया देखकर, हरित धरा श्रृंगार।। हरित धरा श्रृंगार, बरसती टप-टप बूँदें। नाचें खुशी से मोर, भीगकर मेंढक कूदें।। धन्यवाद प्रभु इंद्र, चले शीतल पुरवाई। मिलता बड़ा सुकून, सुंदर छटा है छाई।।१३८ खोटी किस्मत दीन की , नयी नहीं है बात। रोते गाते कट रहे, उनके भी दिन-रात।। उनके भी दिन-रात, राम की माया कैसी। देख रहे हम आप, कहें क्या क्षऐसी वैसी।। कहें मित्र यमराज, मिले क्या उनको रोटी। आये लेकर साथ, जन्म से किस्मत खोटी।।१३९ जाने कैसा हो गया, मानव का व्यवहार। समझ नहीं अब आ रहा, कहाँ गया संस्कार।। कहाँ गया संस्कार, बड़ी विचित्र है माया। कलयुग का है दौर, उसी की दिखती काया।। कहें मित्र यमराज, आप मत मेरी मानें। बदले नहीं विचार, झूँठ है तुम भी जानें।।१४० हमको सब हैं कह रहे, जलवा तेरा आज। तेरा अब तक चल रहा, निष्कंटक है राज।। निष्कंटक है राज, खूब हैं जलवे तेरे। कोई नहीं करीब, आप सबसे प्रिय मेरे।। कहें मित्र यमराज, कहो मत राजा इनको। कहना हो तो आप, कहो बस राजा हमको।।१४१ जागे ज्योति साधना, भीतर बढ़े उजास। करें समर्पण स्वयं का, मिट जाए सब त्रास।। मिट जाए सब त्रास, आस्था दीप जलाना। भावना हो निर्मल, तभी प्रभु दर्शन पाना।। छिपा रहे जो पाप, सभी लग भागम-भागे। मन की हो जो चाह, सफलता जीवन जागे।।१४२ जितने प्राणी जगत में, यहाँ सभी मेहमान। फिर भी कहते गर्व है, क्या हम कोई दान।। क्या हम कोई दान, हमें कोई ले लेगा। बदले में आशीष, खूब केवल वो देगा।। कहें मित्र यमराज, रंग दिखते हैं कितने। कैसे मिटती भूख, नमूने सपने जितने।।१४३ होती अब वर्चस्व की, चर्चा चारों ओर। जिधर देखिए उधर ही, पड़े सुनाई शोर।। पड़े सुनाई शोर, सभी हैं दिखते ऐसे। छोटी-छोटी बात, तने हैं तम्बू जैसे। कहें मित्र यमराज, संभालो अपनी धोती। लो हमसे गुरु ज्ञान, परीक्षा सबकी होती।।१४४ कलयुग के इस दौर में, हर रिश्ता बेकार। नहीं जेब में दाम यदि, समझें सब लाचार।। समझें सब लाचार, समय की मार देखिए। चाहे जितना आज, लानतें आप भेजिए।। कहें मित्र यमराज, गई सब चिड़िया अब चुग। करो बैठ अब भजन, सीख देता है कलयुग।।१४५ इतना गंदा हो गया, अपना आज समाज। दर्द झेलती बेटियाँ, बेशर्मों का राज।। बेशर्मों का राज, तमाशा सभी देखते। घोंट पी रहे चीख, तभी तो नहीं चेतते।। कहें मित्र यमराज, गिरोगे अब तुम कितना। सुता रही है पूछ, बता दो केवल इतना।।१४६ सतगुरु कृपा से हो गया, अपना जीवन धन्य। वरना अब तक तो रहा, जैसे झाड़ी वन्य।। जैसे झाड़ी वन्य, रहा बस आड़ा-तिरछा। आते रहे विचार, करेगा कौन सुरक्षा।। कहें मित्र यमराज, समय का बदला अब सुरु। रखा शीश जब हाथ, आज मेरे श्री सतगुरु।।१४७ रखते जो खुद को सदा अपने आप प्रसन्न। कहता है कब वह भला, मैं हूँ बड़ा विपन्न।। मैं हूँ बड़ा विपन्न, सोच है पड़ती भारी। करता कब है कौन, बताओ तुम तैयारी।। कहें मित्र यमराज, स्वाद खुशियों का चखते। हर मुश्किल से आप, बचाए खुद को रखते।।१४८ हरियाली चहुँओर अब, शुरू हुई बरसात। खेतों में जुटे किसान हैं, संग खुशी सौगात।। संग खुशी सौगात, सभी आभारी ईश्वर। गाते मन के गीत, बने हैं सभी कवीश्वर।। कहें मित्र यमराज, यही होली दीवाली। चहुँदिश में हो राज, सदा संचित हरियाली।।१४९ कितना कुछ हम तो कहें, रहा कौन सुन बात। नाहक धमकाते फिरें, और मारते लात।। और मारते लात, नहीं संयोग अपहरण। ताना-बाना साथ, बहुत हैं इनके जन-गण।। कहें मित्र यमराज, नहीं है तुमको मिटना। इनसे रहिए दूर, करीबी चाहे जितना।।१५० कलयुग में अब हो गया, आज अपहरण खेल। अपने भी करने लगे, अब तो इससे मेल।। अब तो इससे मेल, भला क्या हो सकता है। इसके आगे आज, कहाँ रिश्ता टिकता है।। बिल्कुल है बेकार, जियो कहना अब जुग-जुग। समझाता यमराज, यही है असली कलयुग।।१५१ जलता आज जहान है, कैसी फैली आग। होते इतने अपहरण, कौन सुनाए राग। कौन सुनाए राग, लोभ लालच का चक्कर। ले सकता है कौन, बताओ इनसे टक्कर। कहें मित्र यमराज, इसी से अब डर लगता। मजबूरी की आग, मनुज जब तब है जलता।।१५२ थोड़ी सी खैरात का, करते खूब प्रचार। कलयुग में सिद्धांत का, अजब-गजब आधार।। अजब-गजब आधार, भूख से कोई मरता। पर इनकी जो भूख, सिर्फ है नाटक लगता।। कहें मित्र यमराज, शर्म चढ़ती कब घोड़ी। रत्तीभर खैरात, बाँटते थोड़ी -थोड़ी।।१५३ तुमको भले न याद हो, दादी नानी प्यार। कलयुग का यह असर है, भूल गए आधार।। भूल गए आधार, कौन तुमको समझाए। शुभचिंतक जो आज, कुटिलता से मुस्काए।। कहें मित्र यमराज, भले तुम भूले उनको। भले दूर हैं आज, मगर आशीषें तुमको।।१५४ वर्षा बिन सूखी धरा, लगता जैसे पाप। इंद्रदेव जी कर रहे, धरती से संताप।। धरती से संताप, नहीं लगता है अच्छा। नंगे होकर नाच, पहनता क्यों है कच्छा।। कहें मित्र यमराज, चलेगा कितना अर्सा। बतला दो अब आज, करोगे कब तुम वर्षा।।१५५ सतपथ के जो नाम पर, सिर्फ स्वार्थ का खेल। जनहित का बिल्कुल नहीं, सत्याग्रह से मेल।। सत्याग्रह से मेल, यही है नीयत जिसकी। लोग करें जयकार, चाल बिन समझें इसकी।। कहें मित्र यमराज, चलाते जो अपना रथ। वही बड़ा है आज, मानते चलता सतपथ।।१५६ अन्ना ने भी था चला, सत्याग्रह का दाँव। अंतिम था परिणाम जो, सिर्फ अधूरा काँव।। सिर्फ अधूरा काँव, चाल चेले ने खेला। अन्ना जी के हाथ, नहीं कुछ आया धेला।। कहें मित्र यमराज, पलटकर पिछला पन्ना। एक बार फिर आज, ढूंढ़ते हम सब अन्ना।।१५७ मिलती है पहचान अब, जो जितना शैतान। आज भला इंसान की, कैसे हो पहचान।। कैसे हो पहचान, सत्य कोई तो बोले। वाले सब क्यों मौन, होंठ अपने तो खोले।। कहें मित्र यमराज, सभ्यता रोज सिसकती। करते जो नित पाप, पुण्य खुद आकर मिलती।।१५८ ईश्वर भी क्या जानते, इसीलिए तो मौन। समझ रहे हम आप भी, कहने को है कौन।। कहने को है कौन, छिपा है मन क्या किसके। अब तक रहा अबूझ, कहें क्या पीछे इसके।। कहें मित्र यमराज, भले सब कुछ है नश्वर। पर दिखते लाचार, कहें हम जिनको ईश्वर।।१५९ सड़कें जल से हैं भरी, रुके नहीं जल धार। छतरी वाला क्या करे, करता यही विचार।। करता यही विचार, नहीं ईश्वर की माया। लालच की है मार, भोगती मानव काया।। कहें मित्र यमराज, बिजलियाँ अब भी कड़कें। हम सब हैं लाचार, जलाजल गलियाँ सड़कें।।१६० जितने भी पाखंड हैं, करते हैं ये लोग। धर्म आड़ में सभी, फैलाते नित रोग।। फैलाते नित रोग, एक अभियान चलायें। बेशर्मी का राग, पकड़ जाने पर गाएँ।। कहें मित्र यमराज, नहीं हम मूरख इतने। झूठ और पाखंड, वार तुम चाहे जितने।।१६१ विधि का अजब विधान है, नयी नहीं ये बात। कुछ को मिलता दुख तो, किसी को सुख सौगात।। किसी को सुख सौगात, चक्र जीवन का चलता। मगर यहाँ पर दाल, भला खुद किसका गलता।। कहें मित्र यमराज, राज हम जानें किसका। अजब-गजब विधान, यहाँ है केवल विधि का।।१६२ धरती पर नित बढ़ रहा, अब पापों का भार। करना हमें विचार अब, क्या ये जीवन सार।। क्या ये जीवन सार, सभी को हो बेचैनी। मगर सभी हैं मस्त, बैठकर खाते खैनी।। कहें मित्र यमराज, बने ये जीवन परती। पूछे हमसे आज, बिलखकर अपनी धरती।।१६३ थोड़ी सी खैरात का, करते खूब प्रचार। कलयुग में सिद्धांत का, अजब-गजब आधार।। अजब-गजब आधार, भूख से कोई मरता। पर इनकी जो भूख, सिर्फ है नाटक लगता।। कहें मित्र यमराज, शर्म चढ़ती कब घोड़ी। रत्तीभर खैरात, बाँटते थोड़ी -थोड़ी।।१६४ तुमको भले न याद हो, दादी नानी प्यार। कलयुग का यह असर है, भूल गए आधार।। भूल गए आधार, कौन तुमको समझाए। शुभचिंतक जो आज, कुटिलता से मुस्काए।। कहें मित्र यमराज, भले तुम भूले उनको। भले दूर हैं आज, मगर आशीषें तुमको।।१६५ वर्षा बिन सूखी धरा, लगता जैसे पाप। इंद्रदेव जी कर रहे, धरती से संताप।। धरती से संताप, नहीं लगता है अच्छा। नंगे होकर नाच, पहनता क्यों है कच्छा।। कहें मित्र यमराज, चलेगा कितना अर्सा। बतला दो अब आज, करोगे कब तुम वर्षा।।१६६ सतपथ के जो नाम पर, सिर्फ स्वार्थ का खेल। जनहित का बिल्कुल नहीं, सत्याग्रह से मेल।। सत्याग्रह से मेल, यही है नीयत जिसकी। लोग करें जयकार, चाल बिन समझें इसकी।। कहें मित्र यमराज, चलाते जो अपना रथ। वही बड़ा है आज, कहें जो चलना सतपथ।।१६७ अन्ना ने भी था चला, सत्याग्रह का दाँव। अंतिम था परिणाम जो, सिर्फ अधूरा काँव।। सिर्फ अधूरा काँव, चाल चेले ने खेला। अन्ना जी के हाथ, नहीं कुछ आया धेला।। कहें मित्र यमराज, पलटकर पिछला पन्ना। एक बार फिर आज, ढूंढ़ते हम सब अन्ना।।१६८ दिखते नित जग में नये, मित्र नमूने आज। बात सत्य जो ना कहे, सत्याग्रह पहचान।। सत्याग्रह पहचान, खेल बड़ा जो खेले। छोटी सी जो बात, करें वो बड़े झमेले।। कहें मित्र यमराज, झूठ जो सबको कहते। हरिश्चंद्र औलाद, जगत में वो ही दिखते।।१६९ आया है जो द्वार पर, उसका हो सत्कार। होना सबका चाहिए, हम सबका संस्कार।। हम सबका संस्कार, मगर अब मरता जाता। पैसा ही आधार, आज हर जन का नाता।। कहें मित्र यमराज, देख सत्कारी माया। नहीं है रिश्तेदार, द्वार जो मेरे आया।।११७० ईश्वर रुप में द्वार पर, करो अतिथि सत्कार। चलता आया देश में, सदियों का संस्कार।। सदियों का संस्कार, नहीं तुम इसे मिटाना। पुरखों का आधार, भूल मत आगे जाना।। कहें मित्र यमराज, जगत में सब कुछ नश्वर। जान रहे हम आप, अतिथि बन आते ईश्वर।।१७१ कहते वेद पुराण भी, प्रणव ब्रह्म का सार। उत्पत्ति से सृष्टि के, ध्वनि गूँजी साकार।। ध्वनि गूँजी साकार, चले जग जीवन धारा। देव दनुज ऋषिगण साथ, शब्द सबको है प्यारा।। कहें मित्र यमराज, ध्यान नित मन जो जपते। प्रणव जगत आधार, मनुज हैं पल-छिन कहते।।१७२ समझेंगे कब लोग ये, बात कही सौ बार। सहना है अन्याय भी, खुद पर अत्याचार।। खुद पर अत्याचार, साधकर चुप्पी बैठे। वो खुद ही जंजीर, बाँधकर रहते ऐंठे।। मौन तोड़कर लोग, न्याय सारथी बनेंगे। कहें मित्र यमराज, लोग कब खुद समझेंगे।।१७३ मिलता बिन मेहनत नहीं, खाली सपने चार। समझेंगे कब लोग ये, जीवन का जो सार।। जीवन का जो सार, राह जो भी हो देख। कर्म करो दिन-रात, भाग्य भी तब ही लेखे। जिसको होता ज्ञान, वही श्रम का फल गिनता। वरना सब बेकार, मुफ्त क्या किसको मिलता।।१७४ सत्ता के हथियार का, दुरुपयोग पुरजोर। चाहे जितना लें मचा, आप सभी नित शोर।। आप सभी नित शोर, पीर सुनता नहिं कोई। यही बनी है रीति, कहें क्या किस्सागोई।। कहें मित्र यमराज, खोलिए अपना पत्ता। बदलें अब कानून, मिले जन-मन को सत्ता।।१७५ मामा-माँ में खून का, रिश्ता सदा अटूट। झगड़ा झंझट प्यार की, आपस में है छूट।। आपस में है छूट, सभी के मामा प्यारे। जाते जब हम रूठ, प्रेम से वही दुलारें।। कहें मित्र यमराज, श्रेष्ठ रिश्तों का नामा। रिश्तों का संसार, जगत में माँ अरु मामा।।१७६ दूजा माँ के रुप को मामा कहते लोग। संग हमेशा हों खड़े, सुख-दुख हर संयोग।। सुख-दुख हर संयोग, करें ना कभी शिकायत। मुस्काते हैं खूब, देखकर आप शरारत।। कहें मित्र यमराज, भरोसा जाता पूजा। मामा होते साथ, नहीं दिखता जब दूजा।।१७७ धीरे-धीरे घट रहा, अब आपस में प्यार। रिश्तों का अस्तित्व ही, लगता है बेकार।। लगे नहीं बेकार, बढ़े नित कुंठा भारी। मसला है गंभीर, आज की जो बीमारी।। कहें मित्र यमराज, कलेजा जन-मन चीरे। भले कह रहे आप, जहर ये चढ़ता धीरे।।१७८ सबके वश का है नहीं, राजनीति का खेल। सबसे मुश्किल है यही, रखना इससे मेल।। रखना इससे मेल, बनाकर दूरी रखिए। बैठे रहकर दूर, स्वाद इसका भी चखिए।। कहें मित्र यमराज, सगे हैं सारे तबके। उम्मीदों की डोर, हाथ में आते सबके।।१७९ झूठे सपने देखते, जस शहरों में मोर। आसमान में देखते , हरियाली हर ओर।। हरियाली हर ओर, ख्वाब यह पाले रहिए। पकड़ पकड़ कर लोग, सभी से कहते चलिए।। कहें मित्र यमराज, कर्म उन सबके फूटे। बड़े गर्व से आप, हमेशा देखें झूठे।।१८० करते रहिए मित्रवर, चुगली सुबहो-शाम। इससे अच्छा कुछ नहीं, और जगत में काम।। और जगत में काम, खूब होगी तब चर्चा। हर प्राणी ही रोज, आपका खोले पर्चा।। कहें मित्र यमराज, लीक पर अपने चलते। निश्चित होता नाम, नित्य ऐसा जो करते।।१८१ अच्छा होगा कीजिए, मौन साधकर काम। चुगली से बढ़ता नहीं, कभी किसी का नाम।। अल्पकाल तो लोग, भले ही करें प्रशंसा। मान लीजिए आप, करेंगे कल ये हिंसा।। कहें मित्र यमराज, देख फूलों का गुच्छा। होता नहीं है यार, समय सबका ही अच्छा।।११८२ करते हम सब लोग ही, इतने सारे काम। जिसको मिलता है नहीं, जीवन में आयाम।। जीवन में आयाम, समस्या इतनी भारी। लगती नहीं लगाम, रहे दे खुद को गारी।। कहें मित्र यमराज, नहीं हम इससे डरते। मनमानी हम रोज, भला हम क्यों है करते।।१८३ सारे बाहर बैठकर, कहते हैं हड़ताल। वादे जितने थे किए, कभी न पूछा हाल।। कभी न पूछा हाल, हमारी भी मजबूरी। नहीं समझते आप, बनाकर रखते दूरी।। कहें मित्र यमराज, आज अब देखो तारे। कफन शीश पर आज, बाँध हम बैठे सारे।।१८४ ज्ञानी बनकर घूमते, आज जगत में लोग। और मिटाते नित्य हैं, हुआ नहीं जो रोग।। हुआ नहीं जो रोग, चमकता इनका धंधा। देखो मानव राज, बना है खुद से अंधा।। कहें मित्र यमराज, सभी बनते हैं ध्यानी। लूटें इनको आज, भेंट करते जब ज्ञानी।। १८५ करना मत तकरार अब, मुझ पर भूत सवार। केवल नेक सलाह दो, कैसे हो उपचार।। कैसे हो उपचार, किए जो गुंडागर्दी। हिंसा अरु पथराव, चुनौती दे दी वर्दी।। कहें मित्र यमराज, नहीं इन सबसे डरना। अब तो ठोस इलाज, सभी का जमकर करना।। १८६ नाहक ही सहना पड़े, उनको अत्याचार। जो निर्धन असहाय हैं, और संग लाचार।। और संग लाचार, मान ईश्वर की इच्छा। देते रहते रोज, बिचारे कठिन परीक्षा।। कहें मित्र यमराज, सुनो जगती के दायक। हुए धरा पर भार, नहीं हम कहते नाहक।।१८७ ऐसा ही अब वक्त है, सह लो अत्याचार। रोना धोना व्यर्थ है, नहीं सुने सरकार।। नहीं सुने सरकार, भले तुम कितना सीखो। अच्छा होगा आज, मौन रहकर ही चीखो।। कहें मित्र यमराज, बोलता केवल पैसा। इसमें क्या है झूठ, सभी को दिखता ऐसा।।१८८ ऐसा क्यों अब हो रहा, भटक रहा इंसान। फिर भी करता गर्व से, कुंठा में प्रतिदान।। कुंठा में प्रतिदान, बढ़ी जाये बीमारी। नहीं समझते लोग, भूलते जिम्मेदारी।। बनते हम क्यों आज, देखकर दूजा जैसा। क्या है इसका लाभ, सभी बनते जो ऐसा।।१८९ कलयुग का अब आज है, नहीं खोइए होश। इतना भी बनिए नहीं, आप सभी खरगोश।। आप सभी खरगोश, बचाओ अपनी इज़्ज़त। भूले शिष्टाचार, करो बिल्कुल मत हुज्जत।। कहें मित्र यमराज, मुफ्त का सब कुछ लो चुग। और करो तारीफ, बड़ा अच्छा है कलयुग।।१९० सुधीर श्रीवास्तव
