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Sasmita Jena

Abstract Classics

4.5  

Sasmita Jena

Abstract Classics

यह कैसी कशिश है...

यह कैसी कशिश है...

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यह कैसी कशिश है उस पिता के मन की,
जो बरसों तक बेटी की शादी के सपने सजाता है,
और उसकी विदाई के बाद
नम आँखों से कह उठता है—
"आज मेरे घर की लक्ष्मी चली गई।"

यह कैसी कशिश है उस दिल की,
जो किसी को बेइंतहा चाहता तो है,
मगर उसके सामने आते ही
अपनी ही नज़रों को झुका लेता है,
जैसे प्रेम को शब्दों में ढालने का साहस खो बैठा हो।

यह कैसी कशिश है उस हिम्मत वाले इंसान की,
जो अपने साहस से एक कदम आगे तो बढ़ा देता है,
लेकिन ज़िम्मेदारियों का बोझ
उसे दो कदम पीछे लौटने पर मजबूर कर देता है।

यह कैसी कशिश है उस मन की,
जो किसी को अपना मान तो लेता है,
पर स्वयं को टूटने से बचाने के लिए
उसी अपने को पराया बना देता है।

यह कशिश भी कितनी अजीब होती है—
एक पल में एहसास दिलाती है
कि पूरी दुनिया अपनी मुट्ठी में है,
और अगले ही पल
सब कुछ रेत की तरह फिसलता हुआ दिखा देती है।

फिर भी,
यह कशिश कभी समाप्त नहीं होती...
क्योंकि यही अधूरी चाहत,
यही अनकहे जज़्बात,
और यही अनमोल रिश्ते
ज़िंदगी को जीने का सबसे गहरा एहसास दे जाते हैं।



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