यह बिन मौसम की बारिश
यह बिन मौसम की बारिश
यह बिन मौसम की
बारिश
सिर पर तनी खड़ी
एक छतरी की तरह ही
तन पर पड़ गई भारी
यह मौसम भी है
एक गिरगिट सा
जब देखो अपने रंग बदलता
रहता है
धूप से बचने के लिए
खोली थी जो छतरी उसे
बारिश के पानी की बौछारों से
भर देता है
आसमान बादलों से कभी
ढक जाता है तो
कभी सूरज बादलों की
बरसाती ओढ़कर
बादलों के घर के भीतर ही कहीं
छिप जाता है
बादल कभी लगते
सफेद रूई के फाहे से तो
कभी बर्फ के बने छोटे छोटे घर तो
कभी परिंदों के उजले फैले पर
कभी आसमान में
घिर आती
काली घटायें मतवाली और
बिजली बादल संग घड़ घड़ शोर मचाती
दिखाती अपने बेहिसाब करतब
आसमान का दिल जब भरा आता तो
वह बेकाबू होकर
एक छोटे नादान मासूम बच्चे की तरह ही
फूट फूटकर रोने लगता और
जमीन को भिगोकर
उसे भी अपने दुख तो
कभी सुख में शरीक कर लेता
आसमान भरा होने के बाद जो
हो जाता खाली और
जमीन पर भी बरसकर उससे मिटा लेता जो
दिल के बीच बढ़ती दूरियां तो
फिर थोड़ा सा खुश भी हो लेता
सुख का अहसास उसे होता
यह कहानी तो थी आसमान
की और
उससे जुड़ी जमीन की
जमीन पर आसमान के नीचे खड़े
बारिश में भीगते उस आदमी का
क्या हुआ जो
घर से निकला था कुछ और सोच के
घर से निकलते ही
मौसम का हाल बदल गया
उसे जो काम करना था
जहां कहीं जाना था
जिस किसी से मिलना था
वह तो बीच रास्ते अधूरा रह
गया
मौसम का मिजाज कब
बदल जाये
किसी राह चलते आदमी का
पांव आगे न बढ़े
किसी कारणवश वहीं रुक जाये
किसी का दिल बदल जाये
किसी के दिलों के बीच पनपते रिश्तों के समीकरण
बदल जायें
कुछ भी कहना एकाएक मुश्किल ही
होता है
एक आस के सहारे तो पर
हर कोई जीता है कि
कब यह बारिश रुके
कब यह रास्ता खुले
कब यह बादल छंटे और
कब एक आशा का सूरज
अपनी किरणों के जाल फैलाता
सबको प्रकाशित करता
बादलों की ओट में से निकले
उदित हो
सबको ऊर्जा प्रदान करता
एक प्रकाशस्तम्भ सा।
