ये कोई क्यों बताइएगा।
ये कोई क्यों बताइएगा।
ये कोई क्यों बताएगा, यह कोई क्यों समझाएगा,
कितना चलना है, कितना रुकना है।
किस मोड़ पर आकर ठहर जाना है,
यह उम्र का पड़ाव कैसे ढलना है।
20 के बाद यह, 40 के बाद वह, और 50 के बाद बस,
यह सोच का दायरा उनसे क्यों निकलना है, उनमें क्यों सिमटना है।
समुन्दर का प्रभाव बन, किनारे से मिलना है,
रात का अंधेरा, सुबह का उजाला,
चाँद की ठंडक, सूरज की जलन —
यह सब उनका क्यों चुनना है?
खुद का जीवन, खुद के दर्पण में ही दिखना है,
इन बेड़ियों को तोड़, खुले आसमान में उड़ना है।
अपनी मुस्कान का पहरा अब खुद ही तो देना है,
आज-कल सब खुद से ही चलता है,
थोड़ा गिरकर ही इंसान और निखरता है,
खुद की मर्जी से ही रुकना और ठहरना है।
किसी और से नहीं, अब खुद से ही मिलना है,
इस एक जीवन को खुद के हिसाब से रखना है।
अपनी ही बगिया की खुशबू बन,
अपने जीवन को महकाना है।
