यात्रा का वृत्तांत
यात्रा का वृत्तांत
याद आ गया एक यात्रा का वृत्तांत,
सामने दिख रही थी बिटिया संभ्रांत,
शायद आई थी घर से होकर वह रूष्ट,
थोड़ी दूर पर घात लगाये बैठा था एक दुष्ट,
ऑंखों से जिसके लालसा टपक रही थी,
कहीं ना कहीं मैं अंदेशा लगा रही सही थी,
यह देखकर मैं उसको छोड़ नहीं सकी अकेली,
मेरे लिये भी वो थी अबूझ अनजानी सी पहेली,
कुछ सोच मैं उसके गई पास,
बगल ही बैठी थी वो उदास,
पहले तो वह थी सकुचा,
फिर थोड़ा सा विश्वास जताई,
मैने उसका पकड़ा हाथ,
डॉंट लगाई जैसे बहुत हूं खास,
लेकर उसको स्टेशन पर उतरी,
ट्रेन छूट गई थी मेरी,
देखा उसको वह भी था उतरा,
भॉप लिया था मैंने खतरा,
बातों ही बातों में वह दिल की बात बता गई,
नम्बर कम आने पर घर में हुई थी लड़ाई,
सामने देखा उसने ललचाई नजर,
उस पल वह भी गई थी सिहर,
पकड़ कर मेरा हाथ वो बोला,
दीदी नहीं छोड़ना अकेली,
हम दोनों करने लगे अगली ट्रेन का इंतजार
जो ले जाती गंतब्य को उसके शहर उसके द्वार,
धीरे धीरे रात का छा रहा अंधकार,
किसी भी पल वो भेडिया कर सकता था प्रहार,
तभी एक भला मानुष समझ गया हमारी दुविधा,
धीरे से पास आकर गुस्से से दिखने लगा भरा,
पहले तो जमकर सुनाई खरी खोटी,
इतना सुन वह जोर जोर से रोने लगी,
मामला बिगड़ता देख भेड़िया वहॉं से चलता बना,
हम दोनों सारा मामला सुनाया उसने नहीं किया मना,
ट्रेन का कर इंतजार हम तीनों साथ चले,
सबेरे जाकर मंजिल पर उतरे,
उसको उसके घर तक पहुंचाया,
माता पिता को सारा हाल कह सुनाया,
भर गईं थीं पिता की ऑंखें मॉं को कुछ समझ ना आया,
उन्होंने बस हम पर जमकर आर्शीवाद और प्यार बरसाया,
फिर हम दोनों भी चले अपने गंतब्य स्थान को,
इस यात्रा की याद लिये अपने जहान को,
कभी कभी अजनबी भी बंध जाते हैं अन्जान से बंधन में,
हम तीनों बन गये भाई बहन इस यात्रा की उलझन में,
अब तो इतना गहरा सा नाता है,
कोई भी खुशी उनके बगैर ना भाता है,
हो गये हैं वो भी मेरे परिवार का हिस्सा,
समझे बच्चों मदद करो मजबूर की बताता है ये किस्सा ...!
