व्यथा
व्यथा
क्यों तुम इतने रुष्ट हो मुझसे ,हृदय पीड़ा अब सह न पाता।
पड़ा रहने दो बस चरणों में, नित-नित जिन पर पुष्प चढ़ाता।।
करबद्ध प्रार्थना तुमसे इतनी, यादों से तुम कहीं दूर न जाओ।
मैं तो ठहरा एक दीन भिखारी, अब तो मेरी तुम बिगड़ी बनाओ।।
युगों- युगों से भटक रहा हूँ, लेकर अपनी यह निर्बल काया।
स्वार्थमय बीता यह जीवन सारा, समझ ना सका बस तेरी माया।।
अवसाद ग्रसित से छूट न पाता, अब तो प्रभु कुछ दया दिखलाओ।
तुम तो हो हृदय वत्सल स्वामी, सेवक की अब लाज बचाओ।।
कृपा करना है काम तुम्हारा, तुम बिन प्रभु अब कोई ना हमारा।
" नीरज" की "व्यथा"अब तो सुन लो, विफल ना हो जाए जीवन मेरा।।
