STORYMIRROR

Vivek Madhukar

Abstract

4  

Vivek Madhukar

Abstract

वरदान ?

वरदान ?

1 min
322

बोला चंदा धरती से

ढक लिया क्यों चेहरा बहना !

शरमा रही क्या तुम

या चाह रही नहीं कुछ भी कहना !


बोली धरती - भइया प्यारे

चुप्पी मेरी तुम समझ सके ना

बच्चे जो थे जां से प्यारे मुझको

चाक कर दिया उन्होंने मेरा सीना !


सूरज बोला लॉकडाउन है

आ रहा मुझे मज़ा बहुत है

देखो पहुंच रहीं तुम तक निर्बाध

किरणों की गर्माहट मेरी

हरियाली कर रही नर्तन

बादल भी कर रहे ठिठोली |


गंगा का जल साफ हो गया

ज्यों मानव का पाप माफ हो गया

कोरोना ने कहर बरपाया है

या यह छुपा हुआ वरदान हो गया !



Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract