वो पत्र
वो पत्र
जीवन से जब मैं हो गयी हताश
चारों ओर था अँधेरा और मन निराश
आशा की कोई किरण न जब दिखे
मायूसी की स्याही से जीवन के दिन लिखे
तभी मिला मुझे एक पत्र
स्मृति में आज भी अंकित है वो चित्र
कठिनाई में काम आए, सच्चा है वो मित्र
मेरी प्यारी सखी का था वो पत्र
उसमें लिखा संदेश जो मैने पढा
मेरे मन में वो ख़त गहराई में गढा
"चलना है मुझे बस दूर तक चलना
गिरना ही मुख्य नही, मुख्य है संभलना"
वे शब्द ले आए नया एक प्रभात
जीवन में हुई नयी एक शुरूवात
आज भी वो ख़त देता है प्रेरणा
जिसने बदल दी थी मेरी धारणा
