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Govind Narayan Sharma

Inspirational

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Govind Narayan Sharma

Inspirational

वो जीवट महिलाएं

वो जीवट महिलाएं

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तपती धूप में काम करके भी मुस्कुराती थी,

जेठ की तपिश में भी शिकन नही आती थी !


दिन ढलने तक खेत मे काम कर लौटती थी,

सर पर रख ईंधन का गट्ठर लेकर आती थी,


गीली लकड़ियां फूँक चूल्हा जलाती थी,

सब को पहले खिलाकर आखिर में खाती थी!


बैठ भरतार के बगल में पंखा झलती थी,

सुख दुःख की बात कर जी हल्का करती थी!


घर में अकेली भी सर पर पल्लू रखती थी,

लाज शरम रखती इशारों में ही बोलती थी!


पो फटते उठ घर भर का आटा पीसती थी, 

नल न थे पनघट से पानी भर कर लाती थी!


कच्चे घरों में भी महलों सा सुख मनाती थी, 

घर में आये हुए अतिथि देव तुल्य मानती थी!


कोई बीमार हो तो तिमारदारी करती थी 

बच्चे को लोरी सुना थपकी दे सुलाती थी!


नादारी भी हो तो जाहिर नही होने देती थी, 

घर की बात दीवारों से बाहर नही जाती थी!


पड़ोस में बच्चें भूखे न सोये पहले खिलाती थी,

कोई याचक दर आये आवभगत करती थी!


सयानी बेटी को गृहस्थ सलीके सिखाती थी,

घर मन्दिर जैसा हो बेटियों को गुर बताती थी

 

तीज त्योहार सखियां हिलमिल मनाती थी, 

चाँद के दीदार को आवाज दे पड़ोसन बुलाती थी,


गाँव में शादी ब्याह में गीत गाने जाती थी,

सब की खुशियों में अपनी खुशी मनाती थी।



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