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Pratit Pingle

Abstract

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Pratit Pingle

Abstract

वो हार बैठा है

वो हार बैठा है

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वो अपनी जीत की ख़ुशी के खुमार में बैठा है

उसे कोई जाकर बताये वो मुझे हार बेठा है


चल तो दिया है नए मंजिलो की तलाश में

लेकिन अपनी पहली मंजिल ही हार बेठा है


रंगीन रातो की ख्वाईशो में वो

अपनी खुशनुमा शाम को हार बैठा है


सिगरेट के धुएं से एतराज था जिसे

वो अब बदनाम महफ़िलो की शान बनकर बैठा है


उसको उसकी जीत क़ी मुबारक कैसे दू

जो खुद को भी हार बैठा है


और अब में और तू ही नजर आते है पन्नो पर

हम तो जैसे डायरी के बहार जाकर बैठा है


वो अपनी जीत की ख़ुशी के खुमार में बैठा है

कोई जाकर बताये उसे वो मुझे हार बैठा है


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