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Kumar Ritu Raj

Abstract

4.1  

Kumar Ritu Raj

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वो अकस्मात जिंदगी में आया था

वो अकस्मात जिंदगी में आया था

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कुछ घबराया हुए कुछ लुभाया हुए

मार्ग किनारे हमने इसे पाया था

उन्हें मदद की आस थी

शायद जीने की विश्वास थी


कुछ ठोकर से आहत था

शायद मेरे पास रह इसे कुछ राहत था

कुछ क्षण पास रह उड़ने का प्रयास था

पर उनका हर प्रयास बेकार था


हमने इन्हें प्रकृति घुमाया था

जब वो चींटियों से घिर

हमने इन्हें तब भी बचाया था

सांस लेना मत भूलना

हमने इन्हें ये सुनाया था


अब रहा ना कुछ दिखाने को

अपनी ताकत दोबारा आजमाने को

आखरी छान वो इस तरह सो गया

जैसे किसी और दुनिया में कही खो गया।


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