वादे निभाने की
वादे निभाने की
मोहब्बत के वो वादे मुझे तुमसे निभाने की रुत है।
यही तो तेरे और मेरे भी नशेमन सजाने की रुत है ।
ख़िज़ाएं बहारों में ढलने लगी हैं ये शाम ।
फ़िज़ाएं भी करवट बदलने लगी हैं ये रात ।
न यूं दूर जाओ कभी मेरी निगाहें चुरा कर ।
यही तो तुमसे मेरी निगाहेँ मिलाने रुत है।
गुलाबों का शाख़ों पे हिलना तो देखो तुम ।
ये शाख़ों से शाख़ों का मिलना तो देखो तुम ।
ज़रा पास आ कर गले तो लगा लो मुझे भी ।
यही तो तेरे और मेरे दिलों को मिलाने की रुत है।
ये हवा महकी-महकी और ये घटा भी बहकी-बहकी सी है ।
आतिश-ए-इ़श्क़ मेरी और तेरी भी अभी दहकी-दहकी सी है ।
कहां जा रहे हो यहां आओ मेरे वो दिलबर।
यही तो तेरे और मेरे दिल-ओ-जान यु लुटाने की रुत है।
मोहब्बत के वो वादे मुझे तुमसे निभाने की रुत है।
यही तो तेरे और मेरे भी नशेमन सजाने की रुत है ।
