उम्र का आईना
उम्र का आईना
आईने से धूल हटाकर,
अंदर झाँका।
साफ साफ नहीं पर,
एक अक्स उभर आया।
कुछ अपना अपना सा लगता,
पर थोड़ा अनजान,
एक चेहरा नज़र आया।
आईने के धूल के साथ, जब
चेहरे की झुर्रियां भी हटी,
तब पर्दे से रहस्य उठ पाया।
यह तो मैं ही था,
कुछ अरसे पहले का मैं
बढती उम्र के साथ
खुद को ही मैं पहचान
नहीं पाया
बढ़ते उम्र, बढ़ती
जिम्मेदारियों के साथ
हम खुद को भी भूल जाते हैं।
जिंदगी के समंदर में पतवार
के साथ खुद को खो जाते है।
ऐसे डूबने के बाद,
शायद ही कोई उभर पाया।
आईने से धूल हटाकर,
अंदर झाँका।
साफ साफ नहीं पर,
एक अक्स उभर आया।
