STORYMIRROR

Roli Abhilasha

Abstract

3  

Roli Abhilasha

Abstract

तुम्हारे साथ शब्दों का सफ़र

तुम्हारे साथ शब्दों का सफ़र

1 min
460

तुम जितने कम हो जाते रहे हमारे भीतर से

कविता फैलाती जा रही अपनी जगह

कभी लौटकर आओगे तो...

हमें मानसून पसंद है पर छतरी नहीं,

हमें नहीं पसंद है सीलन भरी जगहों पर

कुकुरमुत्तों का उगना,


तुम्हारे मौन भरे शब्द और

तुम्हारी अपनी दुनिया में हमें तलाशती

स्नेह से भीगी वो आँखें

कैसे कहें कि इश्क़ ख़िलाफ़ हो गया,

न ही मरी है कोई कविता

लिपटना चाहते हैं हम उन शब्दों से

अमरबेल की तरह, लेकर तुम्हारी

सांसों से पोषण

तुम्हारी देहगंध से अवशोषित होकर

हम जीना चाहते हैं...


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract