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Sukant Suman

Abstract

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Sukant Suman

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तरुण तपस्वी-सा वह बैठा

तरुण तपस्वी-सा वह बैठा

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तरुण तपस्वी-सा वह बैठा

धारण कर धैर्य और ईमान

निर्निमेष वो चिंतन करता

रचता है इक नया कीर्तिमान।।

मुखमंडल से निकलती आभा

जैसे हो शशि की छाया

पौरूष है उसमें ओत-प्रोत

बहता भीतर मधुमय श्रोत।।

है छाई नीरवता मग में

कातर है अब लोग यहां

है जरूरत फिर इस जग को

पीपल की शीतल छाया।।


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