तरंग
तरंग
सबकी जिंदगी में तरंग आती हैं
जब देह नए रंग में आती हैं
जिंदगी में कुछ नए रंग जुड़ते हैं
बाल्यावस्था से किशोरावस्था में
सब कुछ बदलने लगता है।
रंग, आकार, आवाज़, देखने का सलीका
दूसरों के सामने बदलने लगता है
बैठने का सलीका
क्या, क्यों और कैसे हो रहा है ?
समझ नहीं आता क्या हो रहा है।
दूसरों के सामने अच्छा दिखने के लिए
दर्पण के सामने खुद को निहारते हैं
एक-दूसरें के प्रति आकर्षित होकर
बातें करने के बहाने ढूंढ़ते हैं।
नए सपने नए अरमाँ उनके
पंख लगाकर उड़ने को बेताब
सब कुछ बदलने लगता है
अंदर व बाहर दोनों जगह
स्वभाव चिड़चिड़ा होने लगता है।
जो लोग कल तक अपने थे
आज उनकी नजरें पराई लगने लगती है
नया स्पर्श अब प्यार का नहीं
जिस्म का भूखा लगता है।
किससे कहें क्या कहें
समझ नहीं आता
आखिर कैसी ये तरंग हैं
जो रंग हो के भी बेरंग हैं।
