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Babu Dhakar

Abstract

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Babu Dhakar

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तन्हा सा मन

तन्हा सा मन

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यू हीं नहीं कहीं तन्हाई भी मिलती 

बिन महबुब के भी बेवफाई मिलती 

चंचल मन की हिलोरें जो चहकती रहती 

बिन बादल भी कहीं बारिश होती रहती ।


कहानी में कविता लिखी नहीं जाती 

कविता में भी कहानी लिखी नहीं जाती

तौर तरीके है जो अपने आप नहीं उभरते 

अभावों में ही जरूरतों के है चेहरे चमकते।


लिखे यह जो हम शब्दों की माला 

मिला जो था मुझे महबुब वो ना था सच्चा

बरसता रहा भले ही बादल हमारे यहां

फिर भी कहें तो कैसे कि यह घर हमारा कच्चा।


भीगा जो मैं बारिश में तो विभोर हुआ

थोडे समय ही सही मै़ प्रसन्न तो हुआ

भीगा ऐसे ही मैं किसी के प्रेम में 

वो थोडा सा ही सही मुझ पर बरसता तो गया।


भोर भोर में शोर नहीं होता 

शोर हुआ भोर में कि है कोई चोर 

दिल जो चुराया था जिसने हमारा

मद्धम अंधेरे में चोर सा ओझल हुआ।


सारे संगम सपने में ही सुहाने है 

मिले रंग तो और दिखते बेरंग है

अलग अलग रंग सात दिखे जो इन्द्रधनु में

बिना मिले भी संग से बना दृश्य सुहाना है।


कोई घाव हो तो मैं मरहम लगाता

मेरा हमदम तो जीते जी मौत दे गया

हमने पुछा तक नहीं था नाम उनका 

वो जाते जाते मुझे बदनाम दे गया।


एक हलचल रहेगी हमेशा मेरे मन 

मुझसे रूठने की थी ऐसी कोनसी वजह

एक उनके आगे बढने की बडी तलब में।


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