STORYMIRROR

Bhawna Kukreti Pandey

Abstract

4  

Bhawna Kukreti Pandey

Abstract

तमाशे

तमाशे

1 min
392

खुद को 

अब दबा लिया है

तमाम उलजुलूल से दिखते

तमाशों के बीच।


अर्थ हीन तमाशे

जो परवाह नहीं करते

किसी भी प्रतिक्रिया की 

ये बस होते है और आगे बढ़ जाते है

फिर से एक नया करतब दिखाने को

नई उम्मीद और नए कलेवर में

उसी कहानी को 

बार बार सुबह शाम

दोहराते हुए।


हर दिन पहुंच जाती हूँ 

वहां जहां उनकी रौनकें होती हैं

झूठा ही सही पर 

कुछ पल का सुकून होता है

जहां अहसास नहीं रहता

तुम्हारी सौगात का 

तुमसे मिले

अकेलेपन का।



विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract