STORYMIRROR

Surendra kumar singh

Abstract

4  

Surendra kumar singh

Abstract

तमाशबीन बन कर

तमाशबीन बन कर

1 min
214

तमाशबीन बन कर रह गये हैं हम

जब कि ये तमाशा

जो चल रहा है

जीवन के आस पास

उसे एक तमाशा बना सकते थे हम


तमाम दृष्टांत

गुजर रहे है जीवन के आस पास

कि जीवन

सर्वाधिक महत्वपूर्ण है।


हम तमाशबीन बने हुये हैं

जबकि हम

तमाशा दिखा सकते हैं जीवन का

फिर भी

तमाशा बने हुये हैं।


बहुत सोचा

आखिर हम जीवन को

तमाशा बनते हुये

क्यो देख देख हैं

आप को जैसा भी लगे

मुझे लगता है


हमारी महत्वाकांक्षा ही

हमे हमसे दूर लिये जा रही है

और जीवन को तमाशा बनाने

वाले लोगों को जीवन का

तमाशा दिखाने के लिये


लौटना पड़ेगा अपनी ओर

जीवन की ओर

मनुष्य होने के एहसास की ओर।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract