तकली से बुने,तूलिका से रंगे
तकली से बुने,तूलिका से रंगे
तकली के महीन धागों से जो सपने बुने।
उसमें समय की तूलिका से असल रंग भरें।।
जीवन की इस तूलिका,भरे अनेकों रंग।
कर इनका उपयोग हम,जीते अपने ढंग।।
प्रथम रंग है सत्य का,दिखता शुद्ध सफेद।
पालन इसका अल्प हो,रहता है मतभेद।।
कर्म रंग दूजा भरा,रंग दिखे यह लाल।
प्रचलित इसको रखे भाग्य, चले सत चाल।।
क्रोध रंग है तीसरा, रहे हमेशा साथ।
अतिशय इसके योग से,संकट लगता हाथ।।
आलस चौथा रंग है, सुंदर इसका रूप।
अर्थ हीन नर रख इसे,समझे खुद को भूप।।
लोभ रंग है पांचवां,रहे सभी के संग।
इसका समझें अर्थ सब,अपने अपने ढंग।।
छठा अहिंसा रंग है,दिखता बिल्कुल अल्प।
क्षेत्र बढ़ा इसका मनुज,खोजो अगर विकल्प।।
रंग प्रेम का सातवां,रहता सबके पास।
इसका पावन मूल है,श्रद्धा अरु विश्वास।।
बैर रंग है आठवां,क्रोध घृणा है मूल।
मानव इससे हो ग्रसित,उपजाता खुद शूल।।
नवम घृणा का रंग है,रहता छाया रूप।
मानव इससे हो ग्रसित,गिरता गहरे कूप।।
रंग दशम व्यवहार का,जीवन का यह सार।
इसके शीतल रूप से,मिलती खुशी अपार।।
प्रत्येकतू लिका रंग का,करके उचित प्रयोग।
जीता जीवन हर्ष से, सुफलित हर उद्योग।।
