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ritesh deo

Abstract

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ritesh deo

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तेरे सताए

तेरे सताए

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बदनामियां बचाए हुए तो हैं।

नज़रों को झुकाए हुए तो है।।


अब शिक़ायत नहीं कोई।

ज़हर हम खाए हुए तो है।।


ख़ामोशियों में हमने भी।

गीत गुन गुनाए हुए तो है।।


किसे खबर दग़ाबाज़ी की।

वो गद्दार छुपाए हुए तो है।।


कातिल तू अपनी आंखों में।

अश्कों को छुपाए हुए तो है।।


हम जो कहते वही करते हैं।

तेरे नखरे उठाए हुए तो है।।


छोड़ कर हम जमाने को।

तेरे दर पर आए हुए तो है।।


अब ज़माने से डरना कैसा।

हम तेरे सताए हुए तो हैं।।


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