तेरे जाने के बाद..
तेरे जाने के बाद..
शिशिर जाने को है,
ग्रीष्म ऋतु बैठा है चौखट पर...
हरित नव परिधान ओढ़ने को बेताब धरा
बसंत के आगमन को है आतुर।
हर ओर एक नई उमंग, उल्लास
गुनगुनी धूप सी सुहाने लगी है,
पीत सरसों संग पल्लवित हो
पुरवइया सरगम गा रही है।
नवल कोंपले चटकने लगे हैं
हर बगिया महकने को है आतुर,
भौरों के गुंजन को बेताब
नव रंग सा बस गया है मन में।
पलास अद्ध कुम्हलाया अर्द्ध निंद्रा में
बुझ गई है उसकी प्यास,
देख धरा के नित नए रूप
जग गई है मन में आस।
फूल भी महकने लगे
नव उल्लास हृदय उमड़ने लगा
आम्र बौंरो को देख-देख
तितलियों का मन मचलने लगा।
कोयल की कुहु कुहू की
मिठास कानों में घुल रही है
जैसें नव पल्लवों ने दिल से
हर शाख अपने हाथों सजाई है।
प्रकृति का अद्भुत नवाचार
हर पल हर्षित हो रहा मन
बसंती फूलों के चमन में
फिर क्यों दिल में है सूनापन..?
क्यों खुशनुमा बसंत में भी
आंखों में है ये पतझड़ .?
क्यों नीर बह रहे हैं
सिसक सिसक रुक रुक कर?
क्यों यादों में मेरे पैबंद सा
अब लगने लगा है,
क्यों सांसे थमने लगी
दम सा घुटने लगा है..!
तेरे जाने के बाद कई बसंत आए
और बुझे मन चले गए
जिंदगी यूं वीरान तुम बिन
सूनी पगडंडियों में ठहर गए।
उम्मीदों की इन शाखों में
कोपलें मुरझाने लगी,
अरमा थे जवां जो कभी
वो मंद लौ सी बुझने लगी।
ये तन्हाई, ये दर्द बेइंतहा
वो बहारें सब रूठ से गए,
पसरा जो अंधेरा आस पास
हम जीते जी ठूंठ बन गए।
मुझे शिकवा है बसंत से..
पर शिकायत करूं किससे,
बस खड़ा हूं तन्हा यादों में तेरे
लिए हजारों अनगिनत किस्से।
टूटे अरमानों संग तस्वीर लिए
बुझे मन अब बिखर रहा हूं
सूनी राहों पर पतझड़ सा
सूखे पत्ते सा सिसक रहा हूं।
उस बसंत से इस बसंत तक
जाने क्या कमी सी रह गई
डूब रहा मैं धीरे धीरे
जैसे मेरी जिंदगी अब ठहर सी गई ।
