STORYMIRROR

GOPAL RAM DANSENA

Abstract

4  

GOPAL RAM DANSENA

Abstract

सुना है कि....

सुना है कि....

2 mins
239


आज सोते हैं कई फुटपाथ पर

अपने जीवन को रख ताक पर

भूख को ले आगोश में रात भर

सुना है कि उनके खुद का घर होगा

सुना है कि अब का दिन बेहतर होगा I

उम्मीद का उड़ान ,खग सा आकाश पर

बुक पढ़ा हर सम्भावनायें इजाद कर

औलाद निकला है काम की तलाश पर

सुना है काम मिलेगा उनको घूमना न दरबदर होगा

सुना है कि अब का दिन बेहतर होगा I

फ़सल उपजा कर देश का जो पालन करते

लालायित उनकी नजरें सुख की आस करके

बदहाल हो भूख और कर्ज के कारण मरते

सुना है आय होगा दोगुना खाना पड़ेगा न जहर होगा

सुना है कि अब का दिन बेहतर होगा I

देश सीमा पर पहरा हमारे वीर जवानों का

देश हित जान लुटाते फिक्र न खुद के अरमानों का

राह तकती उनकी, नजर संतति वामा नादानों का

सुना है शहीदों के जन का पूछ परख ता-उमर होगा

सुना है कि अब का दिन बेहतर होगा I

कहीं दिन तो अभी कहीं रात है गोपाल

बात ये चलती कभी गाँव शहर चौपाल

कई बनेंगे कई मिटेंगे हर पांच पांच साल

ये राजनीतिक बातें, कभी इधर होगा तो कभी उधर होगा

सुना है कि अब का दिन बेहतर होगा I


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract