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KAVITA YADAV

Abstract

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KAVITA YADAV

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सुबह का भुला

सुबह का भुला

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सुबह का भुला हूँ दोस्तों राह भटक जाऊ

तो थाम लेना,नादानी करूँ तो मुझे राह में 

ना छोड़ जाना


ईमान अगर रखते हो, तो ईमान दिखाना

ना करना बेईमानी अपने दिल से तुम

इंसान हो जानवर ना बनाना


हाँ करता हूं, आवारगी हाँ करता हूं बेईमानी !

अपनी माँ का आँचल ना मैंने, अब पकड़ा !

इस बेईमानी भरी दुनिया में

मैंने कई बार अपना अकेला पन झेला


डिग्रियां है मेरे पास,पर पैसा नहीं है

अनुभव भी है,पर नोकरी नहीं है।


कैसे घर को चलाऊ अपने,की मेरी माँ अकेली है

हस्ता हूँ सामने ये कहके की माँ फिक्र ना कर

अभी तो कल और भी है


इसलिए राह भूल जाऊं तो ना कहना

ये सही नही गलत करके भी सही है


सुबह का भुला, नहीं हूँ बस मेरी इतनी

औकात नही हैं, इस बड़े लोगों के जैसे

मेरे सपने भी गरीबी के है।


मैं सुबह का भूला नहीं

मेरी तो शाम भी भूली है

मेरी तो रात भी भूली है।


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