स्त्रियाँ अब मौन नहीं..!
स्त्रियाँ अब मौन नहीं..!
स्त्रियाँ...
संभाल लेती हर बोझ
हर उलझन / हर दुःख
और..
लोगों के हर ताने / उलाहने को
वो बखूबी निभाती हैं
हर कर्म क्षेत्र के अपनी जिम्मेदारी को
अपने लहू से सींचती
अपनी संतानों को तो
सींचती हैं खेत खलिहानों को
अपने मेहनत से और
अपने पसीने से भी ।
वो संभालती हैं मोर्चा देश रक्षा का
तूफानो में सर्द गर्म मौसम में
सीमा पर खड़ी होकर
प्रहरी की तरह
तो कभी वो बन जाती हैं
घर के हर बीमार व्यक्ति की डॉक्टर,
और निभाती हैं एक परिचारिका (नर्स) की भूमिका
कहीं इन्हें बना दिया जाता है रुदाली
तो कहीं पर यही स्त्रियाँ
लोगों द्वारा डायन / कुलक्छीनी
कहकर कर दी जाती हैं
बार बार अपमानित
अपने अधिकार के लिए लड़ती हुई स्त्रियाँ
कहीं चरित्रहीन तो कहीं
करार दे दी जाती हैं बागी का
पर...
अब स्त्रियाँ..
नहीं डरती हैं इन सब से
उन्होंने बना लिया है इन सब का हथियार
और..
अपने मौन /अपने कार्य और कुशलता से
देती हैं मुँह तोड़ जवाब
समाज में उसकी बागडोर खींचे हुए
समाज के ठेकेदारों को।
स्त्रियाँ...
मौन हैं पर मौन नहीं
वे अब भूलना जान गई हैं
बेमतलब के रूढ़ीवादी बंधन को
और बखूबी जानती हैं तोड़ना भी
स्त्रियाँ...
अब बदलने लगी हैं ख़ुद को
वक़्त और दौर के साथ।
