Exclusive FREE session on RIG VEDA for you, Register now!
Exclusive FREE session on RIG VEDA for you, Register now!

Shailaja Bhattad

Abstract


3  

Shailaja Bhattad

Abstract


सरहद की माटी

सरहद की माटी

1 min 234 1 min 234

घर का वो कोना आज सुनसान था

उसे भाई की कलाई का इंतजार था।

छांव बनूंगा तेरी कहता नहीं थकता था

किस्से धूप के भरपूर सुनाया करता था। 

आज चुप्पी-सी है। 

सरहद की माटी की आंगन में खुशबू सी है

लेकिन वो कोना विश्वास लिए बैठा है ।

आज भी पूजा की थाली में रोली कुमकुम सजाए एकांत में डूबा है। 

आज राखी बंधेगी ,तिरंगे की आन में कलाई जरूर सजेगी

अब कोई कोना कभी अकेला नहीं होगा

कलाई का इंतजार कभी इस तरह नहीं होगा

माटी के कण-कण में खुशबू महकेगी ।

उस कोने में अब कभी खामोशी नहीं सजेगी।


Rate this content
Log in

More hindi poem from Shailaja Bhattad

Similar hindi poem from Abstract