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Sudhir Srivastava

Abstract

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Sudhir Srivastava

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सोरठा छंद

सोरठा छंद

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धर्म

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सबसे सुंदर धर्म, अपना सबको लग रहा।

समझ रहे जो मर्म, मुट्ठी भर ही लोग हैं।।


रोज नया उपदेश, धर्म-कर्म का दें सभी।

खुद इसका परिवेश, जिन्हें नहीं कुछ है पता।।


अपनी-अपनी चाल, धर्म युद्ध में सब चलें।

बहा रहे हैं राल, इसके पीछे स्वार्थ वश।।


बढ़ा खूब प्रचार, सत्य सनातन धर्म का।

इसको अति विस्तार, महाकुंभ ने भी दिया।।


मानवता है धर्म, दीन दुखी सेवा‌ कहे। 

भला नहीं है कर्म, जीवन में इससे बड़ा।।

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वचन

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गए राम वनवास, पिता वचन की पालना।

गये ईश के पास, त्याग पिता भी देह को।।


उचित मान-सम्मान, आज वचन का है कहाँ।

रहा किसे अब ध्यान, निज के वाणी मान का।


देकर अपना प्राण, वचन निभाया कर्ण ने।

सहकर भारी बाण, मर्यादा को त्याग वो।।


रखा वचन का मान, चीर-बढ़ा कर कृष्ण ने।

सबको इसका भान, लाज बचाया द्रौपदी।।


दिया वचन सम्मान, केवट हठ से राम जी।

करता प्रभु गुणगान, नाव बिठा अपने लिया।।


समझो नहीं उधार, दिये वचन के मान को।

मर्यादा आधार,   इतना रखिए सब सदा।।


निज का बढ़ता मान, वचन निभाने से सदा।

होता है क्या ज्ञान, जिसको इतना है पता।।

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विचार

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मर्यादा का ध्यान, अपनों से व्यवहार में।

सबका रखिए मान, छोटा हो या फिर बड़ा।।


अपने शुद्ध विचार, आप सभी रखिए सदा।

हो उत्तम व्यवहार, होता जीवन पथ सरल।।


रखता सबका ध्यान, ईश्वर रखता है सदा।

उनका बढ़ता मान, जिसके शुद्ध विचार हों।। 


अपने सारे काम, जो विचार कर ही करें।

उसका पहले नाम, सबके होंठों पर रहे।।


करते नहीं विचार, मातु पिता के फिक्र का।

कैसा ये आधार, शर्म घोलकर पी रहे।।

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परिवेश

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वस्त्रहीन हैं लोग, कैसा ये परिवेश है।

या फैला है रोग, कैसा फैशन आज है।।


सत्य सनातन धर्म, विस्तारित परिवेश है।

समझो इसका मर्म, संदेश दे रहा देश।।


जो हमको परिवेश, मातु पिता से है मिला।

मन में भरा क्लेश, कुंठित होते हम सभी।।



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