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Sudhir Srivastava

Abstract

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Sudhir Srivastava

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चौपाई छंद -होलिका दहन

चौपाई छंद -होलिका दहन

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चौपाई छंद - होलिका दहन आओ हम होलिका जलाएँ। भक्ति भाव की ज्योति जगाएँ।। निंदा नफरत दंभ मिटाएँ। अपने सारे पाप जलाएँ।। दहन होलिका भाव समझिए।  अपने मन को पावन रखिए।। धर्म सत्य की जीत सदा हो। चाहे जैसी भी विपदा हो।। विष्णु भक्त प्रहलाद को जानो। राक्षस कुल का था पहचानो।। पितु-सुत में कब कोई मेला।। ईश्वर का ये सब था खेला।। पिता दंभ में निशिदिन रहता। ईश जाप अवरोधक बनता।। पर प्रहलाद कहाँ कम जिद्दी। पुत्र भला होता क्यों पिद्दी।। हिरण्यकश्यप मारन चाहे। पर हर कोशिश व्यर्थ बिगाहे।। बुआ होलिका दंभी रानी। करना चाही थी मनमानी।। चिता एक खासा बनवाया। भक्त दुलार गोद बैठाया।। सेवक उसमें आग लगाए। तव ज्वाला आकाश छुआए।। बहुत  हुआ  तब  हाहाकारा। पावक जब प्रहलाद से हारा। राखी  हुई  होलिका  माया। काम नहीं उसके कुछ आया।। ईश कृपा की अद्भुत लीला। हिरण्यकश्यप का मुँह पीला।। ईश भक्ति की महिमा जानी। दंभ हो गया पानी -पानी।। दहन होलिका यही कहानी। वही कहा जो मैंने जानी।। सतपथ पर हम सबको चलना। दंभी पाप घड़ा मत भरना।। सुधीर श्रीवास्तव  


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