स्मृतियों में शेष
स्मृतियों में शेष
स्मृतियों में शेष ************* आना-जाना प्रकृति का नियम है जिस पर हमारे नियम-कानून, सुख-दुख, मान-मर्यादा, अच्छे-बुरे, अनुकूल -प्रतिकूल, स्थिति-परिस्थिति कद-पद, प्रतिष्ठा, आभामंडल का रंचमात्र भी प्रभाव नहीं पड़ता है। जाने वाला चला गया फिर भी हमें जीना ही पड़ता है, इस जीने के पीछे भी सबके बहाने कुछ तीखे तो कुछ मीठे तराने हैं। सबका अपना नजरिया है मगर जाने वाले का जीवन जीने का भी तो अपना अलग पहिया था। आचार्य पंडित तिलक धारी मिश्र 'शास्त्री' जी जब आज हमारे बीच नहीं हैं, तब उनके परिजनों का उन्हें याद करने का अपना अंदाज है, उनके अंदाज, नजरिए, रहन- सहन, चिंतन, पांडित्य को आत्मसात करने का विविध आयाम है। हमारे अपने जो आज स्मृति शेष हैं कुछ के लिए अशेष, कुछ के लिए विशेष तो कुछ के लिए महज अवशेष हैं। अब यह हमें सोचना है कि कल हमें भी जाना ही है, तब भी हमारे परिजनों का नजरिया ठीक वैसा ही होगा, जैसा अपने स्मृति शेष परिजनों के लिए आज हमारा है, कौन प्यारा, न्यारा, दुलारा, हमारा है या हमने ही उसे मारा है। जीवन का ये चक्र चलता ही रहेगा, समय के साथ हमारे सोचने समझने में बुनियादी अंतर भी नहीं होगा। जरुरत आज ही नहीं आने वाले कल में भी होगी कि हम स्मृति शेष परिजनों की आत्मा को कितना सुकून दे पाते हैं? अथवा औपचारिकताओं के भंवर जाल मे उलझकर खुद हँसते और उन्हें रुलाते हैं। जो भी है, हम आपको ये क्यों बताकर सताते हैं आपके जीवन में दखल देने का दुस्साहस करते हैं। माफ़ कीजिए! हम तो सिर्फ स्मृतिशेष विभूतियों को नमन करते हैं अपनी भूल-चूक माफ करने का अनुरोध करते हैं, मधुब्रत जी के साथ अपनी संवेदनाओं के साथ खड़े हैं उनके पिता नहीं, पिता के उच्च आदर्श श्रेष्ठ व्यक्तित्व, पाण्डित्य, आचार्य, छंदाचार्य और उनकी कलम का गान करते हैं, बारंबार नमन वंदन, प्रणाम करते हैं अपने श्रद्धा पुष्प अर्पित करते हैं उनकी स्मृतियों को जीवंत रखने का एक अल्प, अंकिचन प्रयास करते हैं, उनको याद करते और शीश झुकाते हैं, उनके सूक्ष्म संरक्षण का भाव संजोते हैं, एक विभूति सदृश उनकी स्मृतियों को सहेजने का हम भी आपके साथ प्रयास करते हैं। सुधीर श्रीवास्तव
