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Sudhir Srivastava

Abstract

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Sudhir Srivastava

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दोहा

दोहा

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दोहा - कहें सुधीर कविराय 
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महाशिवरात्रि
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शिव महिमा को जानिए, या फिर शव लो मान।
बस इतना इस नाम का, मंत्र  लीजिए  जान।।

शिव ही  शास्वत  सत्य है, प्राणि  मात्र  का  सार।
फिर चाहे जितना करो, निज  कल्पित  विस्तार।।

भोलेनाथ की आड़ में, नशा  करें  कुछ लोग।
लीला अद्भुत शिव प्रभो, मत कहिए संयोग।।

भूखे हैं शिव भाव के, और नहीं की चाह।
औघड़ दानी ने किया, माँ गौरा से ब्याह।।

जिसका आदि न अंत है, उसका है शिव नाम।
निर्मल  मन  जन  पूजते, आप  बनाते  काम।।

शिव जी के दरबार में, भारी भीड़  अपार।
नीलकंठ से सब कहें, हमको भी दो तार।।

सुबह-सुबह यमराज जी, पहुँचे शिव दरबार।
शीश  झुका  कहने  लगे, दर्शन दो सरकार।।
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नशा/सिगरेट
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बड़ी प्रिए जो आपकी, चिता बनी सिगरेट।
रोने से क्या फायदा, अंतिम है  यह  भेंट।।

सो‌च समझकर पीजिए, दारु शराब सिगरेट।
चाहे  जितना  पीजिए,      नहीं  भरेगा पेट।।

नशा किसी भी चीज का, देता दु:ख हजार।
सुख-समृद्धि से दूर कर, बिखराए परिवार।।

जो  पीते  सिगरेट  हैं, बड़े  मजे  से  नित्य।
डुबो रहे हैं आप ही, निज जीवन आदित्य।।

नशा किसी भी चीज का, होता नहीं विकल्प।
जितना जल्दी  हो  सके, ढ़ूँढों  मित्र  प्रकल्प।।
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तंग
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भाई बहनों में सदा, होती रहती जंग।
अपनों से जब दूर हों, तब रहते हैं तंग।।

मर्यादा  का  हो  रहा, बुरा बहुत अब  हाल।
उससे ज्यादा तंग है, मनुज हृदय का जाल।।

तंगहाल  तो हैं  मगर, उनका  हृदय  विशाल।
खाते हैं मिल-बाँटकर, दिखें सदा खुशहाल।।

कपड़े  छोटे  हो  रहे,     और  संग  में  तंग।
फैशन के इस दौर के, अजब-गजब के रंग।।

अंग  प्रदर्शन  के  लिए, कपड़े  होते  तंग।
और शिकायत आप से, कर्म पिता सब भंग।।
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होली
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बच्चों  के  हुड़दंग  से,  बूढ़े   होते   तंग।
मारपीट जब वो करें, देख-देखकर दंग।।

होली में अब वो कहाँ, पहले वाला रंग।
महँगाई से तंग है, संग  मिलावट भंग।।

ननद भाभियों का नहीं, प्रेम प्यार का संग।
दोनों दिल  से तंग हैं, लक्ष्मण  रेखा  भंग।।

होली  का  त्योहार  है,    डालो  प्यारा  रंग।
बूढ़े, बच्चे, बीमार को, पर मत करना तंग।।

होली के अब आड़ में, दुष्ट ढ़ूँढ़ते दाँव।
नारी  होती  तंग  है, वो करते हैं काँव।।
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विविध
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सतगुरु सुमिरन कीजिए, हो कोई भी वार।
वही  करेगा आपका, जीवन  बाधा  पार।।

सतगुरु सुमिरन नाम का, इतना सा है सार।
द्वंद्व छोड़ निश्चिंत हो, रखकर  दूर  विकार।।

सचमुच  मैं  पागल  हुआ,      समझा  मैंने  आज।
फिक्र किसी की क्यों करूँ, समझ गया जब राज।।

नाहक  इतना  ज्ञान  क्यों, व्यर्थ  बाँटते  आप।
कलयुग का इक सार है, करो स्वार्थ का जाप।।

चलो न ऐसे मार्ग पर,   जिसका ओर न छोर।
मन की वाणी भी सुनो, व्यर्थ करो मत शोर।।

कांटे पर चलिए मगर, बड़े ध्यान से आप।
चलो न ऐसे मार्ग पर, घात लगाए पाप।।

मन दुविधा में हो तनिक, चलो न ऐसी राह।
पहले खूब विचारिए, रोको  मन  की  चाह।।

बड़ा अनूठा  जन्म  से, देता स्वयं प्रमाण।
हँसता है वो प्रेम से, सहत जीवन त्राण।।

गाँव भूल हम फँस गए, यहाँ बहुत है शोर।
समय हमारे पास है, चलें  गाँव  की ओर।।

धन वैभव यूँ ही नहीं, मिलता ये लो जान।
व्यर्थ बैठकर आप भी, नहीं खुजाओ कान।।

बिना कर्म कुछ कब मिले, मुफ्त दे रहा ज्ञान।
जानबूझ  मूरख बने, या  फिर  हो  अंंजान।।

खुशियाँ देकर वो गई, था उसका अधिकार।
आँखों  में आसूँ  लिए, सौंपा  प्यार  दुलार।।

मेरी  वो  है  लाड़ली,  मेरा  जीवन  सार।
ऐसा मुझको लग रहा, देगी मुझको तार।।

जिसकी मुझे तलाश थी,  ईश कृपा के साथ।
आकर पीछे  से  रखा, मम  कंधे  पर  हाथ।।

पहले आप उधार दो, पीछे करो तलाश।
या फिर घर  बैठिए, होते  रहो  निराश।।

आप मदद जाकर करो,  होना है बेकार।
और एक दिन आप से, वहीं करें तकरार।।

भला धरा पर कौन है, जिसको कहें अशोक।
किस माई के लाल में, सके शोक को रोक।।

कभी -कभी सच मौन हो, कहता दर्पण बात।
मानो   मेरी   बात   या,  चाहे   मारो   लात।।

आज जान पहचान का, होता है नुकसान। 
बुद्धिमान यदि आप हैं, तभी बनेगा काम।।

आज स्वयंभू बन करें, खुद का खूब बखान।
भले शून्य से अधिक का, उन्हें नहीं है ज्ञान।।

आप कलम को दीजिए, सदा उचित सम्मान।
माँ  शारद  की  हो कृपा, नित्य  बढ़ेगा ज्ञान।।

अपना कहना सरल है, मगर कठिन अपनत्व।
काम पड़े तब गुम रहें, बक-बककारी  तत्व।।

धोखों  का  संसार  है ,  माथा-पच्ची  व्यर्थ।
जिसे समझ इतनी नहीं, निश्चित लिखा अनर्थ।।

समय  पड़े  तब  पूछते,      वही  हमारे  मित्र।
बिना स्वार्थ जो खींचते, मम जीवन का चित्र।।

संत वेश धारण  किए,  करते  ऐसे  काम।
कलयुग के ये हैं सभी, कालिनेम के राम।।

शांत सौम्य स्वभाव ही, रखते संत सुजान।
व्यर्थ तमाशा मत करें, पाते अतुलित मान।।

मुखिया केवल नाम के, नहीं रहा अब भाव।
नीरस जीवन हो गया, छुपा रहे निज घाव।।

फैल  रहा  है  जगत  में,   उन्मादी  उत्पात।
ज्वालाएं प्रतिशोध की, चलता जूता लात।।

ज्वाला शीतल कीजिए, क्यों कर व्यर्थ विवाद।
सब मिल ऐसा कीजिए, सुखदा जिसका याद।

सतरंगी  परिधान  में,   बच्चों  का  अंदाज।
अकड़ दिखाते इस तरह, जैसे हों महराज।।

भला  चाहते  देश  का,        बंद  करो  खैरात।
कुछ सोचो सरकार अब, नहीं खिलाओ भात।।

बेमतलब  की  रेवड़ी, बढ़ा  रही  है  भार।
चाह रहा है देश भी, बाँटो  मत  उपहार।।

बिना शर्त के कीजिए, आप सभी व्यवहार।
बढ़े  प्रेम  सद्भाव भी,     दूर  रहे  तकरार।।

शर्त सदा ही  जीत  की, देती  हमको  राह।
ऐसी शर्त से क्या भला, पैदा करती आह।।

दाना-पानी के लिए, करना पड़ता कर्म।
हर प्राणी का यही है, सबसे पहला धर्म।।

अभिमानी जन नित करें, निज का ही गुणगान।
समझ  नहीं  वे  पा  रहे, सिमट  रहा  है  मान।।

मुखिया बनने के लिए, मची देखिए होड़।
अपने भी इस द्वंद्व में, देते  रिश्ता  तोड़।।

आये  खाली  हाथ  थे,  जाना  खाली  हाथ।
फिर भी गाना गा रहे, जन्म-जन्म का साथ।।

उस रास्ते पर मत चलो, जिसका ना हो बोध।
निश्चित  ही  उस  राह  में, आना  है  अवरोध।।

क्यों जाना उस राह पर, जिसका ओर न छोर।
नहीं पकड़  में आ रही, हाथ किसी  के  डोर।।

ज्ञान  नहीं  यदि आपको, चलो  न  ऐसी  राह।
इच्छा अपने आपकी, करो दबाकर आह ।।

ऐसा रस्ता मन चुनो, जो  दे  तुमको घाव।
जानबूझकर व्यर्थ में, आप गिराओ भाव।।

अपने भी लगने लगे, अब तो आज सूदूर।
कलयुग का यह रंग है, या बनते मजबूर।।
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कौन निकट है आपके, बड़ा  प्रश्न  है  आज।
सोच समझ अब लीजिए, तभी बचेगा लाज।।

बच्चे अब सुनते नहीं, मातु-पिता की बात।
अपने मन की कर रहे, रुला रहे दिन रात।।

हमने  माना  आपको,    सदैव  अपना  ज्येष्ठ।
मगर कभी क्या आप भी, बनकर आए श्रेष्ठ।।

ताना  हमको  मारते,      सब  अपने  ही  लोग।
भला फिक्र मैं क्यों करूँ, यह सामाजिक रोग।।

अब दुनिया में दिख रहे, कैसे - कैसे  लोग।
जैसे नित अब बढ़ रहे, भाँति-भाँति के रोग।।

चिंता अपनी कीजिए, करते रहिए योग।
इस चक्कर में बिन पड़े, कैसे-कैसे लोग।।

चिंता अपनी कीजिए, करते रहिए योग।
इस चक्कर में बिन पड़े, कैसे-कैसे लोग।।

कैसे -कैसे लोग अब, दूषित रखें विचार।
नीति-नियम सिद्धांत का, भूल रहे आधार।।

आप नहीं क्या जानते, राजनीति का खेल।
कैसे -कैसे   लोग  भी, बेंच  रहे  हैं  तेल।।

ताना  हमको  मारते,      सब  अपने  ही  लोग।
भला फिक्र मैं क्यों करूँ, यह सामाजिक रोग।।

समय आड़ में कूदकर,आ जाता संयोग।
आप सोचिए ईश का,  है बेवजह प्रयोग।।

मत कहिए संयोग से, बिगड़े सारे काम।
इसके पीछे आप हैं,  टकराते थे जाम।।

यह  कैसा  संयोग  है,  दुनिया  में उत्पात।
दुश्मन चाहें इन दिनों, कैसे हो प्रतिघात।।

कवि-लेखक के साथ में, यह कैसा संयोग।
निर्धनता अरु बेबसी, आया  चला प्रयोग।।

आया समय मशीन का, यही समय की माँग।
चूक हुई तो एक दिन,सब कुछ  होगा  राँग।।

ए आई की शरण में, गिरे जा रहे लोग।
बहती गंगा में सभी, करें दिखावा योग।।

तकनीकों के जाल में, उलझ रहें हैं लोग।
लोग हुए बेकार अब, क्यों मानें संयोग।।

रोजगार गायब सभी, बढ़ा मशीनी जाल।
मानव नित अब हो रहा, दिनों -रात बेहाल।।

सुधीर श्रीवास्तव


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