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Sudhir Srivastava

Abstract

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Sudhir Srivastava

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दोहा

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दोहा - कहें सुधीर कविराय  *********** नूतन सूर्य उजास में, मत  छोड़ो  तुम  आस।    सतगुरु चरनन सौंप सब, करो नवीन प्रयास।। इसका उसका कुछ नहीं, सब कुछ प्रभु के नाम। जैसा  भी  वो  चाहते,         करते  रहिए काम।। सभी अजनबी इन दिनों, बने हुए हैं लोग। जबसे पीड़ित मैं हुआ, सब कहते हैं भोग।। कल तक थी जो अजनबी, आज वही संसार। आज  लुटाती  खूब  है,    बेटी  बहन  दुलार।। हो जाते सब अजनबी, जब दुख में हों आप। कल तक नहीं अघा  रहे, कहते  माई-बाप।। फेंक रहे हैं अजनबी, प्रेम प्यार का जाल। बहन बेटियाँ जो फँसी, गईं काल के गाल।। अच्छा  है  बनकर  रहें, आज  आप  से  दूर। कल बनकर क्यों अजनबी, रोने को मजबूर।। ताकत जिसके पास है, उनसे डरते लोग। यह कैसी है बेबसी, या केवल सुख भोग।। जो हैं ताकतवर यहाँ, करें खूब अन्याय। बड़े मजे से बैठकर, पीते दिनभर चाय।। चाहे  जैसा  युद्ध  हो,  मरती जनता आम। फिर भी कहते आप हैं, न्यायोचित है काम।। युद्ध न होना चाहिए, सब मिल खोजो राह। तभी भला है विश्व का, मौन रहे तब आह।। मरते अक्सर नागरिक, जब भी होता युद्ध। भूल  रहे  अब  तो  सभी, जो संदेशा बुद्ध।। हम कितने पाषाण है, आद्र न होती आँख। पर  सबसे  आगे  रहें, सदा  मानने  माख।। ज्ञान  और  विज्ञान  का, अद्भुत  होता  मेल। दोनों मिलकर खेलते, लाभ- हानि के खेल।। भारत के विज्ञान का, बढ़ता नित्य प्रभाव। शुभचिंतक खुश हो रहे, दुश्मन माने घाव।। ज्यों ज्यों आगे  बढ़ रहा, आज  तंत्र  विज्ञान। उतना निर्भर हो रहा, जन जीवन अभियान।। ******* यमराज मित्र के होली दोहे  ******** कहते हैं  यमराज  जी, छोड़ो  रंग  गुलाल। भंग आप जमकर पियो, सारे दूर मलाल।। भंग पिए यमराज जी, पहुँच गये दरबार। मस्ती में कहने लगे, क्यों करना तकरार।। पत्नी जी को देखकर, उतर गया सब रंग। दारू बोतल हाथ में, और पिए थी  भंग।। होली में कहने लगे, मम प्रियवर यमराज। अब तू मेरा काम कर, मुझे आ रही लाज।। होली में करते सभी, जमकर खूब धमाल।  बूढ़े बच्चे युवा हों, सबके  मुखड़े  लाल।। माथ अबीर सजाइए, प्रेम प्यार के साथ। सभी बड़ों का पाइए, शीश अशीषे हाथ।। रंग अबीर गुलाल से, होली खेलो आप। मर्यादा को लाँघकर, मत करिएगा पाप।। प्रेम प्यार से हम सभी, खेलें रंग गुलाल। बहुरंगी इस पर्व का, ऊँचा रखिए भाल।। होली  का  संदेश  है,  छोड़ो  बीती  बात। अब से पहले जो हुआ, दादा भैया तात।। होली की शुभकामना, आप करो स्वीकार। रंग अबीर गुलाल का, है  पावन  त्योहार।। प्रेम  प्यार  सद्भावना, रंगों  की  बौछार। भेदभाव को भूलकर, बाँटो प्यार दुलार।। मनभेदों को भूल कर, गले मिलें हम आप। होली  की  सौगात  दें, मिटा सभी संताप।। छोटों को हम प्यार दें, संग अबीर गुलाल। और बड़ों से लीजिए, ऊंचा करिए भाल।। नाली  में  पीकर  पड़े, भूल  गए  हुड़दंग। हाथ जोड़कर गा रहे, डालो मुझ पर रंग।। भंग रंग में पड़ गया, नशा  हो  गया  दूर। बीबी ने दौड़ा लिया, टपकाती मुख नूर।। आपस की तकरार से, होता है नुकसान।  बंद करो तकरार अब, रहे देश की आन।।  होली का त्योहार  है, खूब लगाओ रंग। भाईचारे  से  रहे  , भारत की पहचान।। रंग  बिरंगा आ  गया, होली  का  त्योहार। प्रेम प्यार सद्भाव का, अनुपम बहे बयार।। बूढ़े  बच्चे  वृद्ध  के, लाल गुलाबी गाल। रंगों के त्योहार की , माया करे कमाल।। रंग  बिरंगे  लोग  सब, हैं  मस्ती में चूर। होली के संदेश का,  मान रखें भरपूर।। नाहक में अब मत करो, आपस में तकरार। होली के संदेश का, आप  समझिए  सार।। अर्पण अपने पाप को, दहन होलिका संग। भक्ति रुप प्रहलाद का,   पीत पावनी रंग।। ईश कृपा से बचे थे, भक्ति प्रिए प्रहलाद। जली होलिका स्वयं ही, था उसको उन्माद।। जली होलिका स्वयं ही, पाक-साफ प्रहलाद। दोनों  को  अपना  मिला, कर्मों  का  प्रसाद।। सब मिल जुलकर गाइए, रंग-रंगीला फाग। चाहे जैसा आपका, सुरो ताल लय राग।। मस्ती में सब गा रहे, अपने धुन में फाग। रंग अबीर गुलाल से, सुना भैरवी  राग।। रंगोत्सव का लीजिए, आप सभी आनंद। मर्यादा के साथ हम, करें नहीं  छलछंद।। रंगोत्सव का कीजिए, आप सभी सम्मान। रंग अबीर गुलाल को, दें मधुरिम पहचान।। रंगोली  पर  भी  चढ़ा, आज  संजीला  रंग। ईश  कृपा  इतनी  रहे, रंगीला  नहिं  भंग।। सुधीर श्रीवास्तव  


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