सोच में ही आदमी की जीत है।
सोच में ही आदमी की जीत है।
सोच तेरी जीत साथी, सोच तेरी हार है
सोच ही करती भँवर के पार है,
जिन्दगी तेरी, समर है जीतना
अनगिनत बाधा रहे या तम घना।
हारने की सोच से तू भीत है
सोच में ही आदमी की जीत है।
क्या पता किस राह पर अवसर मिले
किस दिशा में मंजिलें सत्वर मिलें,
बंदकर रखना नहीं निज खिड़कियाँ, दर
हार भी आती कभी सौभाग्य लेकर।
दुर्भाग्य में सुन जो छुपा संगीत है
सोच में ही आदमी की जीत है।
सोच ले जाती अमीकर के पटल
हार जाता सिन्धु जो गहरा, अतल,
सोच- से पर्वत - शिखर झुकता रहा
आँधियों का वेग तक रुकता रहा।
फिर नया बनता विजय का गीत है
सोच में ही आदमी की जीत है।
