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संजय असवाल "नूतन"

Abstract

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संजय असवाल "नूतन"

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सोच के दायरे

सोच के दायरे

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मेरी सोच उसके दायरे

मेरे स्वयं के अंतर्मन में बंधे हैं

उन्हें लांघना मेरे बस में नहीं

पर मुझे पसंद भी नहीं,

कि कोई उस पर बंधन बांधे

या लांघे उसकी सीमा को

बिना मेरे मन को समझे।

जब भी ऐसा होता है

एक द्वंद सा होने लगता है

मेरे मन मस्तिष्क में

रक्त का प्रवाह बढ़ जाता है

मेरे ह्रदय में और

सांसें अवरुद्ध होने लगती है।


पर फिर कुछ पल बाद

मैं मुक्त हो जाता हूं

उसके प्रभाव से

लेकिन उसकी अमिट छाप

मेरे दिलों दिमाग में

एक प्रेम रूपी जाल बन

मुझे इस कदर घेर लेती हैं

कि मैं चाह कर भी

मुक्त नहीं हो पाता,

या होना नहीं चाहता

और जीने लगता हूं

उसकी ही सोच बन कर।


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