STORYMIRROR

Amol Nanekar

Classics

3  

Amol Nanekar

Classics

संडे

संडे

1 min
247

बहुत दिनों बाद वो संडे आया था

आज मैंने छुट्टी ही लिया था

हर बार मैं छुट्टी मानकर चलता रहा

हर बार ऑफिस से बुलावा आया था।


ऑफिस वालोंको यह बात पंसद नहीं आयीं

मैंने तो सिर्फ छुट्टी का ख्वाब सजाया था

हम डूब गये रात और अंधेरे में

न जाने आज कितना पेग लगाया था।


मैं जहाँ जाता वहाँ संडे नहीं आता

वो तो पिछले ही साल आया था

खुद को ही छोड़ कहीं और जाना 

इस मौत के समंदर ने बहुत पढ़ाया था।


पूरी उम्र इस धुँए में घुटकर

मैंने अपनी क्रिएटिविटी को ही बुझाया था

पता नहीं वो पल कहाँ से आया था

उसने आज रात को दिन से मिलाया था।


ଏହି ବିଷୟବସ୍ତୁକୁ ମୂଲ୍ୟାଙ୍କନ କରନ୍ତୁ
ଲଗ୍ ଇନ୍

More hindi poem from Amol Nanekar

वक्त

वक्त

1 min ପଢ଼ନ୍ତୁ

चयन

चयन

1 min ପଢ଼ନ୍ତୁ

जिद

जिद

1 min ପଢ଼ନ୍ତୁ

नजर

नजर

1 min ପଢ଼ନ୍ତୁ

Similar hindi poem from Classics