STORYMIRROR

Arpit Shukla

Classics

3  

Arpit Shukla

Classics

वाक़िफ

वाक़िफ

1 min
261

छाए हैं अंधेरे, कैसे भला आफताब करूं

चेहरों को किस-किसके बेनक़ाब करूं


मेरी ज़िंदगी को तमाशा बनाने वालों

ख़ुदा बैठा है ऊपर, मैं क्या हिसाब करूं


आखिर कब्र में ही होंगे ज़मीं औ आसमां

क्यों न जिंदगी के पन्ने जोड़ किताब करूं


कदमों में महबूब के झुकना कोई गैरत तो नहीं

ये इश्क-ए-दस्तूर है मैं क्यों इसे खराब करूं


जिसकी फितरत से अब तक वाक़िफ नहीं हूँ

उसके सवालों का भला मैं क्या ज़वाब करूं।


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Classics