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Vimla Jain

Tragedy Action

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Vimla Jain

Tragedy Action

समुंद्र की करुण पुकार

समुंद्र की करुण पुकार

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 है इंसानों जरा जाग जाओ।

मुझको तो यूं ना तड़पाओ।

कर दिया है मुझे तुमने विवश यूं पुकार करने के लिए।

इतना कचरा इतना प्रदूषण फैला दिया है मेरे किनारे।

जिसको जो मर्जी आए। करता कभी पेट्रोल, तेल है मुझ में डालता।


 कभी कुछ कचरा है डालता।

 कभी कभी तो आग भी लगा देता तेल डाल कर कितना प्रदूषण तू है फैलाता।

 जीव सृष्टि जो रहती मुझ में उसको है तू नुकसान पहुंचाता।

किनारों पर जो तू मकान बनाता सारा कचरा मुझ में डालता।

नदियों को प्रदूषित कर प्रदूषित पानी मुझ में डालता।


अपार अकूट प्लास्टिक कचरा डालकर तू मुझको नुकसान पहुंचाता।

मत भूल की समुद्र मंथन में देवताओं ने अमृत भी मुझसे है पाया।

 साथ में थोड़ा विष भी पाया।

 कहीं ऐसा ना हो कि मैं अमृत की जगह विष ही उगलने लग जाऊं।

 और तुम सबको मैं मजा चखाऊँ।


जाग रे इंसान मुझ पर मुझ को तूफान पर चढ़ने पर मजबूर ना कर।

जो कुदरती संपदा है, उसका तो रक्षण कर।

नहीं तो जो तूफानों की संख्या बढ़ रही है और यह बढ़ जाएगी‌।

 एक दिन यह धरती भी मुझ में गर्क हो जाएगी।


इतना ना तू मुझको सता

प्राकृतिक संपदा के छोरी रक्षा कर।

मुझ में ना प्रदूषण फैला।

तभी मुझ में छिपा खजाना तो पा जाएगा।

और जिंदगी में चैन भी तभी आ जाएगा।


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