सिंहावलोकनी दोहा मुक्तक...
सिंहावलोकनी दोहा मुक्तक...
जागो-जागो सब सखी, कान्हा आए देख।
देख-देख मन भावनी, देख भाग्य का लेख।।
लेख लिखो हे प्राण तुम,बहुत रहे हो दूर।
दूर लगे नजदीक में,किस्मत में हो रेख।।
रेखा कैसे खींचते, कान्हा सा हों दक्ष।
दक्ष शिवा के मृत्यु में, हेतु रहे थे यक्ष।।
यक्ष होत है यम सदा,काल रंग है लाल।
लाल काल के प्रीत में, भरा रहे मन कक्ष।।
